13 जून 2018

कविता: छांव यादों की...

अप्रिल महिने में प्रतिदिन एक कविता ब्लॉग पर प्रकाशित करने का एक प्रयास किया था जो कि आप सबके प्रोत्साहन से यशस्वी भी रहा। वे कविताएं अंग्रेजी में हैं। उन्हीं में से एक कविता 'शैडोज' का हिंदी रूपांतरण आज की कविता 'छांव यादों की...' मुझे आशा है कि ये रूपांतरण भी आपको मूल कविता जितना ही सार्थ लगेगा।

01 मार्च 2018

भावस्पंदन: नयनाभिराम

रात के साढ़े ग्यारह बजे हमारी बस मुंबई से धुले की ओर चल पड़ी । बस  धीरे धीरे शहर को छोड़कर हाईवे पर आते ही  अपनी रफ़्तार तेज करने लगी। दो दिन मुंबई की अपरिचित भाग दौड़ से छूटकर अपने शांत धुले की ओर मेरा मन बस के साथ साथ तेजी से चलने के बजाय अभी भी भगवान स्वामीनारायण के मंदिर में  ही रुका हुआ था। शांत, अविचल। भगवान की अति सुन्दर मूर्ती और मैं। 

24 जनवरी 2018

भावस्पंदन: मुक्ति है मनोलय

हृदय से कुछ पंक्तियां उठीं,

"मनसे ही है सृष्टि मनसे ही है प्रलय
मनमें विराजत काल, मुक्ति मनोलय"

उनका अर्थ जिस तरह से ह्रदय में प्रकाशित हुआ वह 'मनन' इस आलेख में। 

सृष्टि में जितने भी लोक -- पृथ्वी, स्वर्ग, नरक या इनके अलावा -- जितने भी लोक माने गए हैं सब मन के ही कारण हैं, उनका होना या ना होना इस संदर्भ में होनेवाली हर अनुभूति मन के ही कारण है।

24 नवंबर 2017

स्तोत्र: जीवनानुबन्ध

अनुबन्ध विशिष्ट समयावधि के लिए किये जाते हैं। पर कुछ अनुबंध जीवनभर के लिए होते हैं। मेरा अनुबन्ध किसीके साथ जीवनभर के लिए हुआ है उसी जीवनानुबन्ध पर यह स्तोत्र।

स्तोत्र भगवान की स्तुति में कहे, गाएं या लिखे गए हैं। आजका स्तोत्र चैतन्यपूजा को समर्पित है। चैतन्यपूजा को ब्लॉग के रूप में आज सात वर्ष पूर्ण हुए।

चैतन्यपूजा मेरे लिए केवल ब्लॉग ही नहीं पर  ईश्वर का मंदिर है, ईश्वर भी है और ईश्वर की आराधना भी। ध्यान, ध्येय और ध्याता इन तीनों का लय समाधि है। यहां, इस चैतन्यपूजा में, लेखनरूपी साधना का विषय, लेखन करानेवाला ईश्वर और लेखिका तीनों 'चैतन्य की पूजा' ही हैं।

26 अक्तूबर 2017

श्वासयज्ञ: भाव चिंतन

चैतन्यपूजा में महायोग पर प्रकाशित स्तोत्र 'श्वासयज्ञ' के अर्थ और भावों का चिंतन।

शोक मोह सब छूट गए: सुख दुःखों से ही जीवन है। फिर भी कोई ये नहीं चाहेगा कि जिंदगी में शोक के प्रसंग से गुजरना पड़े। परंतु दुःख शोक को अनुभव करना ही न पड़े ऐसा शायद ही किसीका जीवन हो।

महायोग साधना के प्रति पुनः पुनः कृतज्ञता भाव हृदय में इसलिए उठता है क्योंकि साधना शोकग्रस्त होने से, मोहग्रस्त होने से रक्षण करती है। और कभी मन शोक के आधीन या मोहग्रस्त हो ही जाए तो इनसे उसे छुड़ाने का कार्य भी साधना ही करती है।

24 अक्तूबर 2017

साधनास्तोत्र: श्वासयज्ञ

नवरात्रि के निमित्त महायोग साधनारूपी भगवती की आराधना और कृतज्ञता स्वरूप यह कविता लिखने का संकल्प था। पर जल्दी जल्दी में साधना पर स्तोत्र पूर्ण करने के प्रयास में साधना को ही समय ना दिया जाए तो यह विरोधाभास होता। स्तोत्र लिखने का सबसे बड़ा आनंद यह प्राप्त हुआ कि महायोग साधना के विषय में अधिक गहरा अवगाहन करने को मिला।