01 मार्च 2018

भावस्पंदन: नयनाभिराम

रात के साढ़े ग्यारह बजे हमारी बस मुंबई से धुले की ओर चल पड़ी । बस  धीरे धीरे शहर को छोड़कर हाईवे पर आते ही  अपनी रफ़्तार तेज करने लगी। दो दिन मुंबई की अपरिचित भाग दौड़ से छूटकर अपने शांत धुले की ओर मेरा मन बस के साथ साथ तेजी से चलने के बजाय अभी भी भगवान स्वामीनारायण के मंदिर में  ही रुका हुआ था। शांत, अविचल। भगवान की अति सुन्दर मूर्ती और मैं। 

24 जनवरी 2018

भावस्पंदन: मुक्ति है मनोलय

हृदय से कुछ पंक्तियां उठीं,

"मनसे ही है सृष्टि मनसे ही है प्रलय
मनमें विराजत काल, मुक्ति मनोलय"

उनका अर्थ जिस तरह से ह्रदय में प्रकाशित हुआ वह 'मनन' इस आलेख में। 

सृष्टि में जितने भी लोक -- पृथ्वी, स्वर्ग, नरक या इनके अलावा -- जितने भी लोक माने गए हैं सब मन के ही कारण हैं, उनका होना या ना होना इस संदर्भ में होनेवाली हर अनुभूति मन के ही कारण है।