27 जून 2018

व्यंग: नेताओं की फकीरी

आजके समय में राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव नजर आ रहा है। फकीर लोग झोला लेकर जनसामान्यों के नेता बन रहे हैं और अपने बढ़ते कार्य से जनता के जीवन में फकीरी का तोहफा ला रहे हैं।

आपको शायद ये लगे कि एक दार्शनिक सन्त के लिए नेता बनना कोई मुश्किल काम नहीं होगा। आखिर जिसे संसार का मोह छू नहीं सका उसे सत्ता क्या कर लेगी!

13 जून 2018

कविता: छांव यादों की...

अप्रिल महिने में प्रतिदिन एक कविता ब्लॉग पर प्रकाशित करने का एक प्रयास किया था जो कि आप सबके प्रोत्साहन से यशस्वी भी रहा। वे कविताएं अंग्रेजी में हैं। उन्हीं में से एक कविता 'शैडोज' का हिंदी रूपांतरण आज की कविता 'छांव यादों की...' मुझे आशा है कि ये रूपांतरण भी आपको मूल कविता जितना ही सार्थ लगेगा।

01 मार्च 2018

भावस्पंदन: नयनाभिराम

रात के साढ़े ग्यारह बजे हमारी बस मुंबई से धुले की ओर चल पड़ी । बस  धीरे धीरे शहर को छोड़कर हाईवे पर आते ही  अपनी रफ़्तार तेज करने लगी। दो दिन मुंबई की अपरिचित भाग दौड़ से छूटकर अपने शांत धुले की ओर मेरा मन बस के साथ साथ तेजी से चलने के बजाय अभी भी भगवान स्वामीनारायण के मंदिर में  ही रुका हुआ था। शांत, अविचल। भगवान की अति सुन्दर मूर्ती और मैं। 

24 जनवरी 2018

भावस्पंदन: मुक्ति है मनोलय

हृदय से कुछ पंक्तियां उठीं,

"मनसे ही है सृष्टि मनसे ही है प्रलय
मनमें विराजत काल, मुक्ति मनोलय"

उनका अर्थ जिस तरह से ह्रदय में प्रकाशित हुआ वह 'मनन' इस आलेख में। 

सृष्टि में जितने भी लोक -- पृथ्वी, स्वर्ग, नरक या इनके अलावा -- जितने भी लोक माने गए हैं सब मन के ही कारण हैं, उनका होना या ना होना इस संदर्भ में होनेवाली हर अनुभूति मन के ही कारण है।