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19 जनवरी 2016

कविता: अनंतता को गले लगाओ

भक्ति हो या मानवी रिश्ते प्रेम के बिना कुछ भी नहीं आज की कविता प्रेम की अनंतता पर...ऐसा अनंत प्रेम जो पूजा बन जाता है

आसमान की ओर देखो जरा
मेरा प्रेम अनंत है
आसमान की अनंतता को गले लगाओ जरा


Image: Blue Sky

मेरा प्रेम अनंत है
तुम्हारे लिए
तुमसे ही था
तुमसे ही है
आसमान जैसा
क्या कहना होगा तुमसे?
तुमसे..फिरसे?
मेरा प्रेम, 
केवल प्रेम 
अनंत,
अकृत्रिम,
सहज ही विकाररहित,
तृष्णारहित
आसमान को नाप सकते हो कभी?
इस अनंतता को नाप सकते हो?
कैसे नापोगे?
जो पाओगे
जो समझोगे
कुछ थोडासा ही
कुछ सीमित सा ही
छोटासा हिस्सा
अपूर्ण मेरे प्रेम का
मैंने कभी नापा नहीं...
आसमान को,
कभी नापा नहीं प्रेम को,
समझा भी नहीं क्या होता है यह
प्रेम की इस अनंत गहरी भावना को
बस किया, करने के लिए
सिर्फ प्रेम ही करना चाहा प्रेम के लिए
प्रेम ही किया अनंत प्रेम के लिए 
तुम्हारे प्रेम के लिए 
प्रेम की गहरी अनंतता जीने के लिए 
हर क्षण अनुभव करने के लिए 
आओ, गले लगाने उस अनंतता को 
समझे बिना
नापे बिना 
किसी नाम के बिना 
अनंतता की किसी सीमित परिभाषा के बिना 
सिर्फ अनंत प्रेम के लिए ही  
संशय छोड़ दो
नापना छोड़ दो
तर्क छोड़ दो
प्रेम है तर्क से परे
ये भक्ति है सारे भौतिक बंधनों से परे
यह असीम है
नीले अनंत आसमान की तरह
सदासे ही था तुम्हारे ही लिए 
जब मेरा अस्तित्व तुमने जाना भी नहीं था तबसे 
ये प्रेम था तुम्हारे ही लिए 
तुम्हे गले लगाए 
तुम्हारे पास 
कभी सोचते हो 
ये सच है या नहीं?
इसे क्या चाहिए?
तुम चिंतित हो 
मैं कैसे समझूँ प्यार को क्या चाहिए?
ये कैसे होता है?
कैसे खिलता है?
मैं क्या करूँ?
क्या अनंत भी कुछ चाहता है?
क्या प्यार भी कुछ चाह सकता है?
मैंने अपने आप को विसर्जित कर दिया उस अनंतता में 
प्यार से प्यार के लिए 
विशुद्ध
अनंत प्रेम...
मेरा
तुम्हारे लिए
मेरा
तुमसे
तुमसे ही 
अनंत गहरा प्रेम
आओ गले लगाएं उस अनंतता को
जहाँ ना तुम रहो, ना मैं...
रहे सिर्फ प्रेम की अनंतता
अनंत काल तक
असीमित प्रेम
विरह वियोग से परे मिलन
अनंत से 
हमारे अनंत गहरे प्रेम से 

This poem in English on Narayankripa:
Embrace The Infinity
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