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20 मार्च 2015

विचारों के बादलों पार आत्मा का निर्विकार स्वरुप

आज बहुत खुबसुरत नजारा देखा, प्रेरणा हमारे आसपास होती है और निसर्ग का सान्निध्य बहुत कुछ सिखाता है | अध्यात्म का जो गहन ज्ञान पुस्तक पढ़कर समझ में नहीं आता, वह निसर्ग के सुन्दर बदलतें रूपोंसे सहजही समझमें आता है | आज का विचारमंथन, विचारों पर ही है | मन में उमड़ती लाखों विचारों की लहरें और उनसे पूरी तरह से अलिप्त आत्मा ! आत्मा का स्वरुप जो मुझे कुदरत ने समझाया, वही आज आपके साथ बाँट रही हूँ!


गर्मी का आरम्भ हो गया है और धुले में तो दिनभर बहुत धूप रहती है | गर्मी के दिनों में मैं काफी उदास रहती हूँ क्योंकी यह तापमान सहना वाकई बहुत मुश्किल होता है, बहुत ही मुश्किल! दिनभर की धूप से तप चुकी चारों दीवारें और गरम छत, और यही क्या कम होता है कि पंखे की गर्म गर्म हवा!

यहाँ के वर्णन में मैं थोड़ी अतिशयुक्ति लाऊं तो यहाँ रहना पंचाग्निसेवन की तपस्या जैसा ही कुछ है| ( पुराने ज़माने में पंचाग्निसेवन नामसे तपस्या की जाती थी, अर्थात चारों तरफ अग्नि जलाके तपती धुप में बैठ कर भगवान  के नाम का जाप करना| शारदा माताजी ने भी ऐसीही तपस्या की थी ऐसा उनके चरित्र में उल्लेख आता है| )

मैं अभी शाम को टहल रही थी और आकाश देख रही थी | संध्या समय को हमारे धर्मग्रंथों में पवित्र माना गया है | और इस समय में संध्यावंदन आवश्यक बताया गया है|

संध्या समय बहुत पवित्र शांत होता है यह मेरा भी अनुभव है| और शायद इसीलिए इस समय में मुझे आसमान और सूर्यास्त देखना बहुत पसंद है| हर सुबह और हर संध्या सूर्योदय हो या सूर्यास्त निसर्ग का एक नया चमत्कार, एक नया रूप सामने आता है और मन अपने आप सारे विचारों शांत हो कर उसमें खो जाता है| कदाचित इसीलिए, संध्यासमय को इतना पवित्र माना गया हो |

तो आज भी दिनभर की धूप से मैं परेशान थी | लेकिन शाम होते ही, जैसे किसी ने जादू की छडी घुमा दी और सब कुछ बदल गया इतना खुबसुरत मौसम हो गया | रोज ऐसेही होता है, वह अदृश्य जादूगर है न!  

आत्मा का चंचल विचारों से अलिप्त निर्विकार स्वरुप: 


अभी यहाँ ऐसाही खुबसूरत दृश्य था| नीम के पेड़ों की ठंडी हवा चल रही थी| बिलकुल शुद्ध हवा! मशीनों का शोरगुल नहीं | खुला आसमान, नीम के पेड़, थोडेसे हलके हलके काले बादल, जैसे निकले थे किसी सफ़र पर!

प्रतिमा: संध्या समय में आकाश


मैं यह सब देख रही थी | मैं उन बादलों को शांति से जाते हुए देख रही थी | बहुत धीरे धीरे वे जा रहे थे, मतलब अगर हम ध्यान से न देखें तो शायद उन्हें हम स्थिर ही समझ बैठें !

बादलों को देखते देखते मुझे एक बात जो पहले साफ नहीं दिख रही थी वह दिखी...

बादल – आसमान से अलग थे | और उनमें जो अंतर था, वह धीरे धीरे अधिकाधिक स्पष्ट दिखने लगा |

काले बादल वह नीला और सफ़ेद आसमान नहीं थे |

बादल तो अपनी रफ़्तार से गुजर रहे थे, आसमान शांत निश्चल अविचल था! निर्विकार था!

निर्विकार परमात्मा की तरह ! मुझे लगा कि आसमान हमारी आत्मा की तरह है और हमारे विचार बादलों की तरह!
हमारी पहली नजर अक्सर बादलों पर जाती है

और

हमारा पहला ध्यान हमारे विचारों की र ही रहता है!

आत्मा की ओर नहीं!

विचार आत्मा नहीं हैं, विचार ‘मैं’ या ‘मेरा स्वरूप’ नहीं हैं!

विचारों में लिप्त होकर हम सुखी या दु:खी होतें हैं पर विचारों को अगर साक्षी भाव से देखें तो पता चलता है यह तो केवल विचार है, अच्छे, बुरे या आनंदित या दु:खी कर देने वाले विचार!

मैं जो वास्तविक मैं हूँ, जो मेरा स्वरूप है वह आत्मा तो उस आकाश की तरह निर्विकार, शांत और स्तब्ध है!

आज जब मैं उन चलते बादलों को और उनसे अलग आसमान को शांत अवस्था में स्तब्ध होकर देख रही थी तब मुझे समझ में आया कि साक्षी भाव क्या होता है! मुझे विचारों से हट जाना चाहिए..और उन्हें देखना चाहिए – उनसे अलिप्त होकर! विचारों से यह अनासक्ती जबरदस्ती नहीं लानी है, यह सहज अवस्था होनी चाहिए |  

काले बादल बिखर रहे थे, टूट रहे थे...पहले वह एकसंध और शक्तिशाली नजर आ रहे थे, उनके पीछे का सफ़ेद आसमान नजर तक नहीं आ रहा था!

और अब उनकी कोई शक्ति नहीं थी !

मेरे मन के बादल भी आज हट चुके थे और मुझे निर्विकार आत्मा का अनुभव हो रहा था |

पहले सिर्फ बादल थे,

फिर बादल और आसमान नजर आने लगा

और बाद में सिर्फ आसमान...

पहले मेरे विचार का अर्थ ही ‘मैं’ था,

बादमें साक्षी भाव से देखने पर पता चला

कि मैं विचारों से अलग हूँ!

और अंत में देखा

तो न ‘मैं’ था न विचार..

केवल शांति गहन शांति परम शांति! 

भक्ती और ज्ञान योग में एकत्व: 


आपको शायद यह लगे कृष्ण के बारे में लिखने के बजाय मैं आज निर्विकार और निराकार परमात्मा के बारे में क्यों बोल रही हूँ? भक्ति छोड़कर ज्ञान की शरण?

साकार - निराकार सब एक है यही तो अद्वैत है!

भगवान के प्रेम में गला रुंध जाता है और आँखों से आँसू बहने लगते है, सिर्फ भगवान ही नजर आता है!

और

कभी आत्मा का ज्ञान भक्ति से परे लगता है और जहाँ सारे शब्द समाप्त हो जातें हैं, और सारे विचार शांत हो जातें हैं; उसीको शायद समाधी कहतें हैं |

ध्यान, ध्येय, और ध्याता का लय!

पर यह अपने आप ही हो जाता है और मेरे खयाल से महायोग की साधनापथ में सबसे ऊंचाई, तो वह इसीमें है - चैतन्य की पूजा ...जो अपने आप होती है!

साक्षी भाव अध्यात्म ही नहीं बल्कि व्यावहारिक सफलता के लिए उपयुक्त:


और अगर मैं अध्यात्म से थोडा व्यवहार की बात करूं तो भी,
साक्षी भाव मन को शांत करता है और हमारा जीवन आसान बनाता है |
इसीलिए मुझे जब भी विचारों की लहरें बहुत परेशान करने लगती है, मुझे आसमान देखना अच्छा लगता है, मन अपने आप शांत होने लगता है |  

सांसे अपने आप लयबद्ध होने लगती है, एक तरफ विचार आते जाते रहतें हैं और दूसरी तरफ साँसे लयबद्ध होती जाती है!

आज जो ध्यान अपने आप आसमान में संध्या समय में हुआ वह मेरे लिये अलग ही अनुभव था | ध्यान की कोई विद्या नहीं होती ऐसा अब मुझे लगने लगा है | आँख बंद करके ही ध्यान हो सकता है ऐसा नहीं है |

अहंकार को मिटानेवाली साधना ही चैतन्य की पूजा है:


जीवन का हर क्षण, हर कर्म अपने आप साधना बन जाए, जिसमें अहम् – अहंकार - यह साधना मैंने की है – यह अहम् पने आप ही उस आत्मा में लय जो जाए तो .. यही जीवन की कृतार्थता है |
सबमें होते हुए भी सबसे अलिप्त!

और मुझे लगता है कि यही वह अवस्था होती है जब हम सर्वोच्च प्रेम का अनुभव भी करतें हैं! प्रेम को जीने लगतें हैं हर क्षण में! इसलिए भक्ती और ज्ञान के मार्ग में भेद है ही नहीं | जब योग होता है तब वास्तव में एकत्व का अनुभव होता है |

चैतन्य की पूजा हर क्षण चलती रहती है....सहजही!


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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!