चिंतन: मनोजय कैसे हो ?

मनोजय कैसे हो? कैसे करें यह प्रश्न नहीं है। करना यह मन के दायरेमे आता है और जहाँतक मन है, मनोजय संभव नहीं।

तो मनोलय ही मनोजय है। परन्तु यह मनोलय कहाँ हो यह एक प्रश्न उठता है ? ईश्वर के नामस्मरण में रममाण हो, जब मन अपने आप शांत हो जाता है, वाणी का बोलना बंद होता है यही मनोलय है। मन रहा ही नहीं तो विजय किसपे प्राप्त करेंगे ।मनसे लड़नेसे मनोजय संभव नहीं।

कुछ देर शांत बैठके देखिये।श्वास अन्दर जा रहा है, बाहर आ रहा है.......बस आप देख रहें हैं। किसी विशिष्ट प्रकार का कोई प्राणायाम नहीं।बस शांतिसे ३ से १८ मिनिट बैठें और देखिये। मन श्वास में विलीन हो जाता है , अपने आप।

आपने तो कुछ किया भी नहीं। पहले शायद विचारों का एक तूफान आये, पर वह भी मिट जाता है और एक अद्भुत शांति का उगम अंतर से होता है, बाहरसे नहीं। बाहर का कोई सुख साथ में नहीं फिर भी यह सुख अंतरसे उठता है। आनंदका सागर खिलखिलाता है, परन्तु शांति ऐसी अनुभूत होती है की बोलने का मन नहीं करता| बस आनंदामृत का पान होता रहता है। यही सच्चा प्राणायाम है।यही समाधी है।यही जीवन्मुक्ति है। पहले थोड़ी देर यह अनुभव होता है, फिर रोज फिर बार बार ....समय बढ़ता जाता है| यह सब हमें हमारे सदगुरुदेव परम पूजनीय श्री नारायणकाकामहाराज ने सिखाया है।

यह महायोग का पूर्वाभ्यास है। महायोग की अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है। यह सब आप स्वयं अनुभव करके देखें।गुरुदेवने इतना महान विचार विश्व के सामने रखा है, परन्तु वह यह पैसे के लिए नहीं है। यह सब बताने के या दीक्षा देने के वह पैसे नहीं लेते। प्राणायाम कोई व्यवसाय नहीं है। गीता में दिए इस महान सन्देश का व्यवसाय होना भी नहीं चाहिए।

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टिप्पणियाँ

  1. Apke lekh padhke, bhi mujhe aanandamrit ke paan ki sukhad anubhuti hoti hai...sundar prastuti :-)Apke lekh padhke, bhi mujhe aanandamrit ke paan ki sukhad anubhuti hoti hai...sundar prastuti :-)

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  2. आरतीजी| देरी के लिए ह्रदयसे क्षमाप्रार्थी हूँ| ...आपको शत शत नमन| हमारा कुछ नहीं, प.पू.गुरुदेव के प्रवचन सुनके यह सब मनमे आया, पहले समझ में नहीं आता था, तो इस विषय पे नहीं लिखती थी|

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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.