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24 जनवरी 2018

भावस्पंदन: मुक्ति है मनोलय

हृदय से कुछ पंक्तियां उठीं,

"मनसे ही है सृष्टि मनसे ही है प्रलय
मनमें विराजत काल, मुक्ति मनोलय"

उनका अर्थ जिस तरह से ह्रदय में प्रकाशित हुआ वह 'मनन' इस आलेख में। 

सृष्टि में जितने भी लोक -- पृथ्वी, स्वर्ग, नरक या इनके अलावा -- जितने भी लोक माने गए हैं सब मन के ही कारण हैं, उनका होना या ना होना इस संदर्भ में होनेवाली हर अनुभूति मन के ही कारण है।


'मन के अस्तित्व के कारण सृष्टि के अस्तित्व तथा मनके अस्तित्व से ही काल का भान होता है' इस वास्तव का ज्ञान होना ही प्रलय है। ये शब्दार्थ में सृष्टि का अंत होना ना होकर सृष्टि के रहस्य का संज्ञान होना है।


Text Image: 'Mukti Hai Manolay'


भूत, भविष्य और वर्तमान त्रिकाल का ज्ञान होने में मनही कारण है। इसे कुछ हद तक इस तरह से समझा जा सकता है, किसी विशिष्ट क्षण में मन जहां स्थित हो, वहीं उसके लिए सत्य है, आनन्द, दुःख, चिंता, भय या अन्य कोई भी भावना उसका उस पल के लिए सत्य है। मन जिस अनुभव में स्थित है वही सृष्टि है मनके लिए।

जब मन भूतकाल में घटित स्मृतियों में होता है उन क्षणों में वर्तमान में वैसी स्थिति या घटना ना हो तब भी उन पलों में, मन के लिए, वही सत्य होती है, उसी तरह से मन भविष्य की योजनाओं या चिंताओं में व्यग्र हो तब भी जो वर्तमान में नहीं है उस घटना या परिस्थिती को मन सत्य मानता है।

मनका प्राण में लय होना और इस स्थिति में जीवन सहज स्थिर होना ही मुक्ति है।

इस ज्ञानतत्त्व को ईश्वर या सदगुरू की कृपा से ही जाना जा सकता है और यह जीवन में सहज स्थिर भी हो सकता है। इसे शब्दार्थों में सीखने या समझने का प्रयास मन की सृष्टि का ही एक रूप होगा। इसे सहजतासे ग्रहण ना होने पर तत्त्व के अर्थ के ज्ञानसंबंधी भ्रम भी हो सकता है।

मनके अस्तित्व का ज्ञान न रहना ये नशे से या बेहोशी से भी हो सकता है। उसे मनोलय नहीं माना जाएगा। उस स्थिति में अचेतन मनका अस्तित्व और क्रियाकलाप तो चलते ही रहेंगे।

सुना जाता है कि कुछ साधु नशे के पदार्थों का प्रयोग समाधि के लिए करते हैं। नशा करनेवालों पदार्थों से होनेवाली अनुभूति या उसका अभाव समाधि नहीं है।

समाधि के बारे में ऐसे विचित्र भरम होने के कारण अध्यात्म, ध्यान, समाधि जैसे गहन विषय व्यंग और उपहास के विषय बनते दिखते हैं।

मनोलय बाह्य पदार्थों से प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीं है। सहज समाधि की स्थिति भी शीघ्र प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीं।
श्वासोच्छवास रूपी यज्ञ के बारे में श्वासयज्ञ स्तोत्र में विस्तार से व्यक्त हुआ है। वही यज्ञ, वह मनोलय मुक्ति का अनुभव कराता है।

अगर कोई समाधी के लिए किसी विशिष्ट बाह्य पदार्थ की आवश्यकता को अनिवार्य बताएं तो वह भ्रमित करने का प्रयास होगा।

मनोलय के बिना अद्वैत का यथार्थ ज्ञान भी संभव नहीं।

अपने मनानुकूल विषय में मन लगना मनोलय नहीं कहा जा सकता। उसका कारण आसक्ति हो सकता है। इसीलिए, हमारा मन जहाँ आसक्ति हो वहीं अनायास ही लगता है, यह मनका स्वभाव जानकर संत ईश्वर से आसक्ति की प्रार्थना करते हैं जिससे संसार की आसक्ति से छूटकर ईशभक्ति में ही मन लगा रहे।

इसका अर्थ आसक्ति को अनुचित मानना या मनको बलात् किसी विशिष्ट दिशा में मोड़ना ऐसा बिल्कुल भी नहीं। परन्तु ईशप्रेम में चिरंतन रहनेवाला आनंद और प्रेम है जो कोई अन्य आसक्ति कदाचित ही दे सके और मुमुक्षु के लिए ईश्वर में आसक्ति मुक्तिपथ निश्चय ही सुगम बनाती है।

मनसे अलिप्त होना, मनका त्याग करना, या विचारों से लड़कर उनसे मुक्त होने का प्रयास करना ये सभी मन की सृष्टि से अलग नहीं। इसलिए ऐसे प्रयासों से मनोलय का आभास निर्माण हो सकता है लेकिन वास्तविक मनोलय नहीं।

मनसे अलिप्त हो पाना ये समाधी की ओर एक कदम हो सकता है पर मनोलय नहीं।

भगवद्भक्ति में सर्वोच्च प्रेम के कारण मन ईश्वर में इस तरह से लीन हो जाता है कि मनका, 'स्व' का, और सृष्टि का अस्तित्व केवल एक ईश्वर ही रह जाता है।

भक्ति के कारण या श्वासयज्ञ से मनोलय मानव को मुक्त का कराता है।

अंततः : स्वर्ग, नरक, ब्रह्मलोक, गोलोक ऐसे लोकोंका उल्लेख पुराणों में मिलता है। वेदों को माननेवाले कुछ मत पुराणों को नकारते हैं। पुराणोक्त व्रतों का बहुत अनुशीलन जहां होता है वहां वेदों में वर्णित सत्य लुप्तप्राय से हो गए हैं।

इसके अलावा आधुनिक समाज में प्रायः बिना अध्ययन किये वेदों और पुराणों को नकारना ही उचित समझा जाता है।

आलेख में जो भी लिखा है वह मेरी निजी समझ है। मेरे मनने सृष्टि को जैसे समझा है वह है। आपके मनने सृष्टि के जिस रूप को समझा है वह आपके लिए सत्य है। इसलिए वह भी सही ही है।

मुझे यह भी लगता है कि हिन्दू मत के अलावा अन्य पन्थों में जिन लोकों का वर्णन है वह जिनके मनने उसे स्वीकार किया है, सत्य माना है उनके लिए सत्य हो सकता है।

इसलिए इस चिंतन को मन के स्वभाव को केंद्र में रखकर देखने की मेरी विनती है। विज्ञान या अंधश्रद्धा, धर्म के भेद और विश्वास, आस्तिकता या नास्तिकता ऐसे विवादों का इस आलेख में कोई सम्बन्ध नहीं लाया जा सकता। ईश्वर का होना जितना किसी आस्तिक के लिए सत्य है उतना ही ईश्वर का ना होना नास्तिक के लिए सत्य है। यही मन की सृष्टि है।

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