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07 दिसंबर 2015

क्या असहिष्णुता पर बहस विपरीत दिशा में खीचीं गई?

चेन्नई में बारिश और बाढ़ से हजारों लोग जब फंसे हुए थे तब संसद में असहिष्णुता पर चर्चा चल रही थी चेन्नई में बारिश की स्थिति एक दिन में ही तीव्र नहीं हुई थी, पर फिर भी असहिष्णुता पर चर्चा करना सांसदों को (और हम सबको भी) ज्यादा आवश्यक लगा चर्चा से कुछ राष्ट्रहित में समाधान निकले तो उस चर्चा का उपयोग है संसद की चर्चा को देखते हुए लगा कि ये चर्चा अलग दिशा में आगे बढ़ रही है इसी विषय पर आज का आलेख 

क्या असहिष्णुताशब्द अस्वीकार्य और अपमानजनक है?
असहिष्णुता का अर्थ अगर हम विचार करें  'सहिष्णु होना' बस इतनाही अपने मत से भिन्न मत के प्रति सहिष्णु होना। इनटॉलरन्स का अर्थ भी इससे भिन्न नहीं असहिष्णु होना, अर्थात एक व्यक्ति, खुद को पसंद होनेवाली बात सही जाना...इससे क्रोध जैसा भाव व्यक्त होता है सहिष्णुता से समन्वय, सम्मान के साथ सहअस्तित्व और अपने विचारों से भिन्न मत को भी स्वीकारना यह भाव प्रतीत होता है 

असहिष्णुता का मुद्दा उठानेवालों के प्रति तुरंत जितना क्रोध और आक्रोश दिखाया गया, क्या ये शब्द उतना ही अस्वीकार्य, अपमानजनक है

कहीं चर्चा और आवश्यक कृति से हल निकलनेवाले विषय को विपरीत दिशा में तो नहीं खींचा गया?

असहिष्णुता पर विरोध की तीव्रता:

पुरस्कार वापस करनेवाले लेखक या कलाकार या जितने भी लोग असहिष्णुता का दावा कर रहे हैं मुझे नहीं लगता कि वो इतनी तीव्रता से, प्रखरता से और क्रोध से अपना मत व्यक्त कर रहे हैं जिनती तीव्र और क्रोधित प्रतिक्रिया उन्हें मिल रही है लेखक और कलाकार किसी विशिष्ट विचारधारा के हो तो भी वे अपने नजरिये से अपना मत रख सकते हैं 

पक्षपात का मुद्दा अलग हो सकता है पर किसी भी व्यक्ति का मत सिर्फ इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि वह पक्षपाती है कलाकार, पत्रकार, लेखक, अभिनेता, फिल्म निर्माता सबने अपने अपने गुट बना लिए हो और एक दुसरे के विरुद्ध खड़े हो ऐसा दृश्य बन रहा है क्या ये सब उचित है? दोनों पक्षों ने इस बारे में विचार करना चाहिए 

इससे विषय की तीव्रता जरूरत से ज्यादा बढ़ रही है असहिष्णुता हो रही है, ऐसा कहनेवालों से ज्यादा उनका विरोध करनेवालोने इस भावना की तीव्रता कहीं ज्यादा बढ़ा दी है 

जब लेखक अपना विरोध जताने के लिए अवार्ड और अवार्ड की रकम वापस करते हैं और उनका विरोध करनेवाले उन्हें ब्याज सहित बरसों की रकम वापस करने के लिए कहते हैं, तो क्या ये सहिष्णु बर्ताव हुआ

किसी भी विषय पर विभिन्न वर्गों की बहस हो तो उसमें आपत्ती क्या हो सकती है?

इसी मुद्दे में यह कहना भी आवश्यक लगता है कि असहिष्णुता के कारण देश छोड़ने की भावना व्यक्त करना एक तीव्र छोर है और तुम लड़ो और बुराइयों को दूर करो दूसरा तीव्र छोर 

जिन्होंने देश छोड़ने का विचार मनमें आता है ऐसा कहा, उन्होंने एक बात दिखा दी कि लोगों की भावनाएं और प्रेम से उनका भी उतना हे लगाव नहीं दिखती देश छोड़ने का बयान वास्तविकता से परे, अतिरंजन का उत्तम नमूना लगता है 

असहिष्णुता की चर्चा के  दौर में कुछ दिनों पहले पाकिस्तानी मीडिया का मुद्दा पढने में आया था इसी हिन्दू उन्माद के चलते पाकिस्तान की निर्मिती हुई थीउसे हिंदी में पढने में आया 
वक्तव्योंको, घटनाओंको अलग अलग सन्दर्भ में, विभिन्न स्वार्थों की पूर्ती के लिए, कैसे इस्तेमाल किया जाता है, आंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या सन्देश जा रहा है, इस बातपर देशहित के लिए सभी ने ध्यान देना चाहिए 

देशविभाजन, आपातकाल, काश्मिरी पंडित और  सिख हत्याएँ - केवल 'असहिष्णुता' थी?

ये चारों मुद्दे असहिष्णुता के मुद्दे से बहुत अधिक व्यापक, गंभीर और भयानक हैं

  • क्या विभाजन हिन्दुओं के साथ सहस्तित्व को नकारना नहीं था?
  • कश्मीरी पंडितों का निष्कासन इससे अलग मुद्दा नहीं था
  • सिख हत्याएं जितने बड़े स्तर पर थी और  उसके  पीछे जो कारण दिया गया था, वो देखते हुए क्या उसे सिर्फ असहिष्णुता कहे?
  • आपातकाल तो लोकतंत्र पर ही प्रतिबन्ध था

सहअस्तित्व को ख़ारिज करना और सके लिए राष्ट्र को तोड़कर अलग राष्ट्र बनाना या उसकी मांग करना इन  प्रकारों को केवल असहिष्णुता नहीं कह सकते असहिष्णुता का लेबल लगाए तो इतिहास की इन विभीषिकाओं की तीव्रता हम कम कर रहे हैं और उसी समय आज की घटनाओं की तुलना में उल्लेख कर करके आज के हालात की तीव्रता बढ़ा रहे हैं

चर्चा का सार विचार: 
विषय को उसकी तीव्रता के अनुरूप चर्चा करें तो समन्वय और समाधान की ओर हम बढ़ सकते हैं लेखकों के अवार्ड वापस करना, अपनी भावना या विरोध दर्शाने का सबसे शालीन तरीका लगा उनका मत सही है या नहीं इस बात पर चर्चा हो सकती है, लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त करने पर आक्रामकता से  उनका अपमान करना उचित और सहिष्णु नहीं लगता

जो सकारात्मक काम देशहित में हो, वह बयानबाजी से ज्यादा आवश्यक है  

सहिष्णुता और असहिष्णुता के मुद्दे से ज्यादा चिंताजनक बात ये दिखती है कि दूरगामी परिणाम, दीर्घकालीन राष्ट्रहित की दृष्टी से निर्णय/वक्तव्य नहीं किए जाते तत्कालिक फायदा ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है