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22 मई 2015

कविता: दिल के शब्द

दिलसे जो भावनाएं  उठें वही लिखना मुझे अच्छा लगता है अच्छा क्या, इसके अलावा कुछ और मुझसे लिखा ही नहीं जाता  शब्द, उपमाएं और भाव भगवान की कृपा के बिना लिखना संभव है ऐसा मुझे नहीं लगता फिर भी कभी कभी लगता है आज 'रचना' क्यों न की जाए, जिसमें वो न हो जो दिल लिखना चाहता है या मैंने सोचा दिल को कुछ और सोचने पर मजबूर करूं देखिए क्या कविता में ऐसा 'प्रयोग' हो सकता है? 



समझ में नहीं आ रहा है क्या लिखूँ आज
आज नहीं लिखना है जो दिल कहता है

जो दिलसे न उठे ऐसा तो कभी लिखा ही नहीं
समझ में नहीं आ रहा है क्या लिखूँ आज

खामोशी के भी कुछ मायने होतें हैं
जो व्यक्त होने के लिए तरसतें हैं

समझ में नहीं आ रहा क्या लिखूँ आज
खामोशी के लिए शब्द आज देने जो नहीं हैं खास

दिल की आवाज भी कभी-कभी मुझे अच्छी नहीं लगती
चुप बैठने की सीख लेकिन दिल को जचती नहीं

रास्ते बदलकर भी बदलतें नहीं कभी-कभी
दिल तो एकही होता है, उसकी राह तो नहीं बदलती कभी

समझ में नहीं आ रहा है क्या लिखूँ आज
शब्द भी जैसे रूठ गएँ हैं पता नहीं क्यों आज

दिल की आवाज को खामोश रखना शब्दों को भी न भाया हो
दिलके साथ ज्यादती करो यह शायद पसंद न आया हो उन्हें    

इस पागलपन का भी कोई नाम हो सकता है?
जिसका अंजाम ही न समझ में आ रहा हो

समझ में नहीं आ रहा है क्या लिखूँ आज
इतनी कोशिशें कर के देख ली

दिल की आवाज ही फिर से बोल पडी है आज 


यह बात केवल काव्य के लिए ही सत्य नहीं है। अपनी शिक्षा का चयन हो या व्यवसाय/ नौकरी का चयन, जीवनसाथी, प्यार कोई भी निर्णय दिल की आवाज दबाकर अच्छा और सही नहीं हो पाता ऐसा मुझे लगता है 

आपको क्या लगता है, दिल की आवाज और उसके शब्दों के बारे में?