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27 दिसंबर 2014

कविता: नन्हें सितारे

आज सुबह सुबह जब मैं उदास बैठी समाचार पढ़ रही थी, कुछ दोस्त आएं मुझे मुस्कुराने ...

सुबह सुबह
यह कौन आए
अनजाने से
अपरिचित परिचित से
जैसे दोस्त पुराने
मुझे पुकारे
साथ खेलने
दौड़ के देखा
यह कौन आज
घर मेरे आया
ये नन्हें सितारे
मुझे बुलाते
बिल्ली के प्यारे बच्चे
मेरे भी तो हैं
दोस्त पुराने
जैसे वो मुझे जानते थे
हमेशा से ही
मुझे देखते ही
बात करने लगे
प्यारसे वो
प्यारे सितारे 
क्योंकी वो तो
जानते हैं
प्यार की बोली
दिल से निकली

वैसे तो उनका प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा था अर्थात माता बिल्ली दूर बैठ के देख रही थी और बच्चे सीख या खेल रहें थें, पर बच्चे तो बच्चे हैं वो तो मुझसे बात करने लगे और माँ परेशान हो गयी स्कूल का समय है, शिक्षा का समय है और यह व्यवधान! माता बिल्ली ना तो मुझे डांट सकती थी और ना ही बच्चों को! उसकी चिंता  देखकर, मैं ही शराफत से, चुपचाप अंदर चली आयी, उनका प्रशिक्षण कार्यक्रम फिरसे हो पाए इसलिए! मुझे बच्चों की आवाज फिर भी आ रही थी....मीठी मीठी सी, भोलिसी पुकार!

बिल्लियाँ जितना प्यार हमें देती हैं उसकी गहराई हम मनुष्य पूरी तरह से कभी समझ नहीं पाते और मुझे तो हमेशा लगता हैं, मैं उतना प्यार उन्हें कभी नहीं दे पाती!  

जब इन बच्चों का जन्म हुआ था, बिल्ली ने हमारी घर के एक कमरे में उन्हें सुरक्षित रखा था, दो तीन दिन बाद उसे कुछ असुरक्षितता महसूस हुई होगी, उसने पास के घर में बच्चों को रखा | काफी लोग बिल्लियों से बहुत नफरत करतें हैं क्योंकी वह दूध चुराती है और इन छोटे बच्चों का ‘झंझट’ तो कौन ले! जिस घर में उन बच्चों को रखा था वहां के मालिक ने बच्चों को घर के बाहर रख दिया | बिल्ली दो बच्चों को उठाके फिर से हमारे घर लेकर आयी, लेकिन तीसरा नहीं ला पाई | वह शायद भूल गयी या कुछ और हुआ कुछ समझ में नहीं आ रहा था | तीसरा बच्चा पड़ोस के घर के बाहर पड़ा था, यह बच्चे इतने छोटे थे की उन्होंने अभी तक आँखे भी नहीं खोली थी | वह घरमालिक बच्चे के पास पानी डाल रहे थे ताकि वह बह जाए | बिल्लियों को कुत्ते, दुसरे बिल्ले, बिल्लियाँ और हम मनुष्य सबसे भय बना रहता है | ऐसी स्थिती में वह अकेला बच्चा पूरी तरह से असुरक्षित था | 

फिर मेरे भाई ने वहां जाकर किसी कागज से उसे उठाकर एक बक्से में रखा, उसे हाथ से स्पर्श नहीं किया क्योंकी वह बहुत नाजुक था | उसे घर लाकर बिल्ली के पास रख दिया और चुपचाप वहां से चले आहे, मैं छुपकर बिल्ली की प्रतिक्रिया देख रही थी, उसका मन एकदम से शांत हो गया उसने बच्चे को अपने से उठाकर गले से लगा लिया| एक दो दिन बाद उसने नयी जगह देखकर वहां अपना घर बना लिया| हमें बहुत चिंता हो रही थी की आगे बच्चे ठीक होंगे की नहीं|

मेरे भाई की यह छोटीसी कोशिश भर दी लेकिन बिल्ली का प्यार देखिये उसका हमारे पूरे परिवार से लगाव हो गया, वह दूध वगैरह कुछ नहीं मांगती| और वैसे तो घर भी नहीं आती हर रोज, कभी कभी आती है तो प्यार से बात करती है| जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो वही बिल्ली फिरसे अपने बच्चों को शिक्षा देते समय हमारे घर लेकर आयी | अब इस पूरे किस्से में मेरा कुछ रोल नहीं था, पर वो बच्चे अपनी मीठी मीठी सी आवाज से मुझे बुला रहे थे....मोहि मोहि...! मैं बहुत लकी हूँ न! मुझे इतना प्यार मिलता है! हाँ!  वह तो अपनी ही भाषा में बोलतें हैं बस दिल की भाषा में वह अपने आप ‘मोहि मोहि’ बदल जाता है | जैसे हम तो अपनी बोली बोलतें हैं और वह भी समझ जातें हैं... 

...वही 'प्यार की बोली जो दिलसे निकली'..!

2 टिप्‍पणियां:

  1. कोई भी जानवर हो इंसान सब प्यार के भूखे होते हैं ...बस पहल करने की जरुरत होती है ....
    प्रेरक प्रस्तुति ...

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    1. बहुत बहुत आभार कविताजी! मुझे इस बात की ख़ुशी है की यह प्रस्तुती प्रेरक बन पाई | आपकी प्रतिक्रियाओं का हमेशा इंतजार रहता है |

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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!