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31 अक्तूबर 2012

हे नीलगगन




आज की प्रस्तुति है, मेरी प्रार्थना नीले आकाश से ! आकाश सर्वत्र है और वह हमें अनुभूति देता है अध्यात्म की, एकत्व की |



यह प्रार्थना पहले अंग्रेजी में प्रस्तुत हो चुके मेरे काव्य O Blue Sky का हिंदी प्रस्तुतिकरण है |  


हे नीलगगन!

मुझे तुम अपने जैसा बना दो
हृदय विशाल, मनमें प्रकाश
और स्मित मधुर विशुद्ध सा
तुम जैसा मुझे भी दे दो


हे नीलगगन!

एक सूर्योदय तुमसे आता है
हर जीवन में प्रकाश लाता है
जीवन को भी जीवन देता है
एक सूर्योदय मैं भी लाऊँ  
हर जीवन में प्रकाश प्रेम का फैलाऊँ
परम आनंद से हर जीवन भर दूँ


हे नीलगगन!

काले बादल तो तुममें भी छाते है
पर जो वर्षा बनके नवजीवन देतें हैं

हे नीलगगन!

मुझे तुम जैसा बना दो
दु:खों के काले बादल
शांति की वर्षा करनेवाले गीत बना दो
इस ह्रदय का संगीत
हर ह्रदय तक पहुंचे
प्रेम से हर जीवन भर दो

हे नीलगगन!

कितना सुन्दर इन्द्रधनुष तुम बनाते हो
वर्षा के बाद
सप्तरंगों से मुस्कुराते हो
असीम शांति के साथ
ऐसाही सुन्दर इन्द्रधनुष मैं भी लाऊँ  
सुन्दर क्षणों के प्रकाश का
सुख दुःख के हर क्षण में
प्यारी सी एक मुस्कराहट का
एक इन्दृधनुष मै भी लाऊं

हे नीलगगन!

तुम सर्वव्यापी हो
सारे जगत में हो
फिर भी सबसे परे हो
अद्वैत क्या है यह
तुम ही तो बताते हो
अपनी अविचल शांति से
अद्वैत में ही अब जीवन
बीतने दो

हे नीलगगन!

मुझे तुम अपने जैसा बना दो

हे नीलगगन!

मुझे तुम अपने जैसा बना दो
जो सबका स्वीकार करे
और
शांति – आनंद का ही प्रसार करे

हे नीलगगन!

मुझे अपनी शक्ति दो
जो प्रेम और द्वेष को स्वीकारें
भावनाओं में उलझे बिना
जो कर्तव्य की पुजा करें

हे नीलगगन!

जो कृष्ण का नीलवर्ण तुझमें है
प्रेम के उस पवित्र रंग से
यह जीवन भी नील बना दो
मुझे तुम अपने जैसा नील बना दो

हे नीलगगन!

सूर्य का ऊष्मा तुम जैसे धारण करते हो
शांति से मैं भी क्रोध का ऊष्मा धारण करूँ
मुझे तुम ऐसा स्थिर ह्रदय बना दो
मुझे तुम अपने जैसा बना दो

हे नीलगगन!

ग्रीष्म के ताप से इस विश्व को
जैसे तुम वर्षा से शीतलता देते हो
मुझे ऐसा शांत स्वभाव दे दो की
मैं विश्व शांति की वर्षा कर दूँ
कलह क्रोध विद्वेष का ऊष्मा
अद्वैत प्रसार से शीतल कर दूँ

हे नीलगगन!

मै जानती हूँ की मैंने बहुत माँगा है
हाँ मै मानती हूँ की इतनी न
मेरी त्याग – तपस्या है
पर मैं यह भी जानती हूँ
वह तुम ही हो जो
मेरी इच्छा पूर्ण कर सकते हो
हे नीलगगन!
मुझे तुम अपने जैसा बना दो

हे नीलगगन!

जब तुम शुक्ल वर्ण बन जाते हो
ज्ञान की विशुद्धता दर्शाते हो
इस ह्रदय से भी वह विशुद्धता
परिवर्तित हो,
जो ज्ञान की प्रकाशक हो

हे नीलगगन!

कितने सारे रंग तुममें प्रकट होतें हैं
जो भक्ति और प्रेम दर्शाते है
मुझे भी वह अनुभूति दो
जिसमें प्रेम का हर रंग भक्ति में
परिवर्तित हो

हे नीलगगन!

मुझे तुम अपने जैसा बना दो

हे नीलगगन!

सूर्योदय हो या सूर्यास्त
तुम सदा अविचल स्थिर हो
जीवन के हर मोड़ पर
सदा अविचल मै रहूँ
ऐसा प्रकाश इस ह्रदय में भी भर दो

हे नीलगगन!

मुझे तुम अपने जैसा बना दो
जीवन के हर क्षण में  
हर यश – अपयश में
हर जय – पराजय में

हे नीलगगन!

मुझे हर बंधन से मुक्त बना दो
मुझे हर बंधन से मुक्त बना दो

हे नीलगगन!

मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो

हे नीलगगन!

मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो

साधना के पथ पे कभी कभी बहुत शंकाएँ उपस्थित होती है, ज्ञानयोग का मार्ग श्रेष्ठ या भक्ति का? कर्मयोग आसान होगा या भक्ति ही सर्वोपयोगी है? वास्तव में देखा जाए तो हम कर्म के बिना नहीं रह सकते, भक्ति और ज्ञान भी एक दुसरे से भिन्न नहीं होता| सबका एकत्व ही अद्वैत है | इस प्रार्थना से निश्चय ही साधक और मुमुक्षु बंधुओं की शंकाएं दूर होंगी ऐसा मेरा विश्वास है क्योंकि लिखते लिखते मेरे भी कई प्रश्नों का उत्तर मुझे मिल गया |   

5 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut sundar likha hai aapne.. this reminded me of a poem by Vajpayee Ji

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    1. पूर्णेंदु जी स्वागत आपका चैतन्यपुजा में| आपके प्रतिसाद के लिए आभार | वाजपेयी जी हिंदी काव्य में हिमालय समान है, मुझे उनकी कवितायेँ बहुत प्रभावित करती है, बचपनसे |

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  2. Beautiful prayer, the sky is indeed a vast expanse of listless qualities and if we are observant enough... it teaches us to live life in the right way. I am so glad you now have many of your answers Mohinee and grateful that you shared this poem here so that we can have find our answers too :)

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    1. Thank you so much Arti..:) Too many questions and confusions when come like clouds sky always help me to see clearly inside my thoughts. :)

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  3. Sarthak, sundar, shikshaprad...Bahut acchi prarthna. Kitna kuchh hai prakriti se seekhne ko... Likhte rahiye..!

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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!