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13 दिसंबर 2010

कुछ अच्छा लगता है .............

ठण्ड चल रही है, हलकी हलकी धूप में एक दिन टहल रहती थी | इतना अच्छा लग रहा था, ऐसा लगा  किसीको बताऊ बहुत अच्छा लग रहा है .........

हलकी हलकी धुप में
टहलना अच्छा लगता है
खामोश खामोश रहना
थोडा अच्छा लगता है 
आजकल दीवानापन मेरा 
जरा अच्छा लगता है
पंछियोंसे बातें करना बस 
अच्छा लगता है 
रामका नाम प्यारा 
सदा अच्छा लगता है
खिला खिला फूल देखना 
हमें अच्छा लगता है 
सद्गुरुजिसे बातें करना 
डर तो लगता है
पर उनका प्यार माँ जैसा 
बस अच्छा लगता है
बातें करना भोली भाली 
यही हमें अच्छा लगता है
आवाज सुनना कोयल की 
प्यारा प्यारा लगता है
अकेलापन आजकल बहुत 
अच्छा लगता है
बातें दिलकी रोज लिखना 
अब यह भी 
अच्छा लगता है
सही गलत लाखों विचार 
छोड़ना सब कुछ अच्छा 
अच्छा लगता है
संन्यास यह मनका 
सदा अच्छा लगता है
अहंकारसे डरती थी 
अब वह भी अच्छा लगता है 
तुलसी का वह पौधा 
कितना अच्छा लगता है.....

भाव: 
संन्यास यह मनका : सतत मनमे लाखो विचार आते है, सही गलत यह वह और पता नहीं क्या क्या ! अनेक वर्षोंसे एक प्रश्न मनमे था, इतने विचार मनमे क्यों आते है....
एक बार एक प्रश्न के उत्तर में मेरे गुरुदेव परम पूज्य नारायणकाका महाराज जी ने बताया था, जब  ( सिद्धयोग ) साधना से उठने के लिए चाहो तो भी आँख खुलती नहीं....यह मनका संन्यास है | वास्तवमे संन्यास लेना तो अति कठिन है.... जब सब कुछ छुट जाये तोही संन्यास है, यह  मनसे होना चाहिए| मनमे विचार हैं तबतक यह संभव नहीं | बस कभी गुरुदेव की कृपा से सारे विचार छुट जाते है, कभी यह भगवान में समर्पित हो जाते है, कभी अपने कर्त्तव्य में, कभी अपने आप होने वाले  श्वसन में | सब कुछ शून्य हो जाता है | बस यही मनका संन्यास !सांसारिक कर्म तो छुट नहीं सकते | जो संन्यास लेते है, कर्म तो उनके भी छुटते नहीं | इसलिए यह मनका संन्यास सर्वोत्तम है | सबसे परे, सबमे रहके!

अहंकारसे डरती थी, अब वह भी अच्छा लगता है : अहंकार अध्यात्म में बाधक है, इसलिए पहले बहुत डरती थी, पर एक दिन गुरुदेव की कृपा से पता चला | मुझे अहंकार नहीं आने देना है, क्या यह अहंकार नहीं | मै ही अहंकार से लडूंगी तो 'मै' तो फिर भी रहूंगी ही , इसलिए जैसे है, अच्छे हैं, भगवान को वैसेही  हो जाये समर्पित | वह देख लेंगे सबकुछ !
जैसे अभी अभी कोई फूल खिला और चढ़ गया भगवान के चरणकमालोमे न उसने कुछ और देखा न सोचा, अपने आप पहुँच गया भगवान के ह्रदयमे |         

और भी कुछ अच्छा लग रहा है .....आगे ..

8 टिप्‍पणियां:

  1. very deep thoughts. Ego (ahankara ) and desire (iccha) both are hindrances in the path. even if we desire to meet god ,that is also a hindrance.
    ego can be sublimed with the supreme force ego. because without the god's support one cannot breathe the next breath.
    only main thing is the blessings (kripa). of god,
    we do duty as per daily life, and leave every thing on him.each n everything is his.

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  2. मन मे अहर्निश उठने वाले प्रश्नोका उत्तर आपने कितने सुदर और सहज
    शब्दोंमे दे दिया | धन्यवाद प्रमोदजी |

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  3. कुंजनजी बहुत बहुत धन्यवाद! आप सब का प्रोत्साहन ऐसाही मिलता रहे.......

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  4. सभी कहते हैं की मैं को भूल जाओ
    परन्तु अहम् ब्रह्मास्मि का मंत्र भी तो पुराणों से ही मिला है
    फिर ऐसी विरोधाभासी बातें....हालाकिं इस बात में कोई दोराय नहीं
    की अहम् या मैं ही सब दुखो की जड़ है....परन्तु मैं तब अच्छा है
    जब आप अपना पहले विकास करें और फिर समाज के विकास में सहयोग दें.
    हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत न हो ......

    बहुत सुन्दर रचना .....बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  5. हृदयसे धन्यवाद नटवरजी!

    यह विषय बहुत गहरा है| मेरा मन सतत अनंत प्रश्नो के द्वंद्व मे फसा रहता है| परंतु आपने जो कहा है उसपर ऐसा लगता है, मै को भूल जाओ और अहं ब्रह्मास्मि दोनो ही सत्य है| जिसे हम 'मै' मानते है वह जीव को | वास्तवमे हमारा स्वरूप जीव नही आत्मा - ब्रह्म है| इसलिये 'अहं ब्रह्मास्मि' नि:संशय सत्य है| परंतु यह केवल शब्द न रहके जीवनका वास्तव अनुभव बने, तभी हमारा परिपूर्ण विकास संभव है, जीव की सर्वोच्च अवस्था जीव-शिव का मिलन!'मै को भूल जाओ', यह आसान लगता है, परंतु मुझे यह नही पता की यह वास्तवमे कैसे करे,जीवन मे कैसे उतारे? जैसा की प्रमोदजी ने कहा ,भक्ती से यह संभव है, सब उसीका है मेरे प्रियतम का! भगवान का! अनायास ही उठ्नेवाला यह भाव! अगर यह स्वाभाविक अवस्था हो गयी तो..वह अपना परिपूर्ण विकास होगा और समाज के विकास मे तो सहयोग होगा ही| अध्यात्म और समाजसेवा मे सच्चा अध्यात्म ही सच्ची समाजसेवा कर सकता है ऐसा ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराजजी ने उपदेश दिया है| सो आपके विचारोसे असहमती का कोई कारण नही| हां! एक बात अवश्य लगती है, गुरुकृपा बिना यह सब संभव नही|

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  6. हृदयसे धन्यवाद नटवरजी!

    यह विषय बहुत गहरा है| मेरा मन सतत अनंत प्रश्नो के द्वंद्व मे फसा रहता है| परंतु आपने जो कहा है उसपर ऐसा लगता है, मै को भूल जाओ और अहं ब्रह्मास्मि दोनो ही सत्य है| जिसे हम 'मै' मानते है वह जीव को | वास्तवमे हमारा स्वरूप जीव नही आत्मा - ब्रह्म है| इसलिये 'अहं ब्रह्मास्मि' नि:संशय सत्य है| परंतु यह केवल शब्द न रहके जीवनका वास्तव अनुभव बने, तभी हमारा परिपूर्ण विकास संभव है, जीव की सर्वोच्च अवस्था जीव-शिव का मिलन!'मै को भूल जाओ', यह आसान लगता है, परंतु मुझे यह नही पता की यह वास्तवमे कैसे करे,जीवन मे कैसे उतारे? जैसा की प्रमोदजी ने कहा ,भक्ती से यह संभव है, सब उसीका है मेरे प्रियतम का! भगवान का! अनायास ही उठ्नेवाला यह भाव! अगर यह स्वाभाविक अवस्था हो गयी तो..वह अपना परिपूर्ण विकास होगा और समाज के विकास मे तो सहयोग होगा ही| अध्यात्म और समाजसेवा मे सच्चा अध्यात्म ही सच्ची समाजसेवा कर सकता है ऐसा ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराजजी ने उपदेश दिया है| सो आपके विचारोसे असहमती का कोई कारण नही| हां! एक बात अवश्य लगती है, गुरुकृपा बिना यह सब संभव नही|

    उत्तर देंहटाएं
  7. सभी कहते हैं की मैं को भूल जाओ
    परन्तु अहम् ब्रह्मास्मि का मंत्र भी तो पुराणों से ही मिला है
    फिर ऐसी विरोधाभासी बातें....हालाकिं इस बात में कोई दोराय नहीं
    की अहम् या मैं ही सब दुखो की जड़ है....परन्तु मैं तब अच्छा है
    जब आप अपना पहले विकास करें और फिर समाज के विकास में सहयोग दें.
    हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत न हो ......

    बहुत सुन्दर रचना .....बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं

चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!