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24 जनवरी 2018

भावस्पंदन: मुक्ति है मनोलय

हृदय से कुछ पंक्तियां उठीं,

"मनसे ही है सृष्टि मनसे ही है प्रलय
मनमें विराजत काल, मुक्ति मनोलय"

उनका अर्थ जिस तरह से ह्रदय में प्रकाशित हुआ वह 'मनन' इस आलेख में। 

सृष्टि में जितने भी लोक -- पृथ्वी, स्वर्ग, नरक या इनके अलावा -- जितने भी लोक माने गए हैं सब मन के ही कारण हैं, उनका होना या ना होना इस संदर्भ में होनेवाली हर अनुभूति मन के ही कारण है।