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29 अप्रैल 2017

कविता: सांसों का सुकून

दूर रहकर भी कितने पास लगते हो तुम
पास होकर दिलके
दूर फिर भी क्यों लगते हो तुम?





साथ होकर भी मेरे क्यों जुदा से लगते हो तुम?
खामोश से रहकर भी सब कुछ कैसे कहते हो तुम?
इस दर्द की दवा क्या हो
की फासले मिट जाए पलभर में
इन दूरियों का अंत अब हो
की फासलों की दीवार टूट जाये एक पलमें
सांसों को सुकून तब मिले
की जिंदगी तुझमें सिमट जाए इस दीवानगी में

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