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20 जून 2016

इंस्टेंट योग के प्रचार प्रसार में वास्तविक योग कितना?

देश की समस्याओं के बीच योग दिवस के सरकारी प्रचार प्रसार पर दिया जा रहा अत्यधिक ध्यान और योग के महत्त्व को विचित्र करके प्रचारित करना इस विषय पर आजका आलेख अगर आपको प्रवाह में बहते जाना पसंद नहीं, अगर आपको आवश्यक प्रश्न उठाना और पूछना पसंद है तो ये आलेख आपके लिए है। 


आपसे एक विनम्र प्रार्थना है कि इस आलेख को किसी की आलोचना के तौर पर मत देखें प्रश्न पूछना और अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढना ये हमारी संस्कृति है। 

कल योग दिवस की 'मेगा' तैयारी का 'शो' राजपथ पर हुआ, उसके के कुछ दृश्य मैंने देखें। योगासनों से कुछ हटकर बहुत ही नए अंदाज में लगे। योगासनों को अजीब वस्त्र पहना दिए हो ऐसा कैलाश खेर और बाबुल सुप्रियो के गानों के साथ बाबा रामदेव को योग के नाम पर, वे जो कुछ भी कर रहे थे, वो देखकर लगा। इसका एक कारण है, मैंने रामदेव बाबा के विचार तब भी सुने थे जब उनका कार्यक्रम १५-२० मिनट के लिए किसी टीवी चैनल पर आता था इतने वर्षों में क्या क्या बदल गया है ये अब ज्यादा तीव्रता से नजर आता है

प्रतिमा:http://khabarindiatv.com/  

योग दिवस की मेगा तैयारी में योग में दिखे बदलाव:

तेजीसे से आसन या एक विशिष्ट शारीरिक क्रिया के अनेक पुनरावर्तन देखने को मिलेयोग के अभ्यास में आधुनिक समय में एक आसन के बाद दूसरा आसन सिखाया जाता है (देरतक आसन स्थिर होनेतक पहले एक एक आसन लोग सीखते थे।) इन पुनरावर्तन में जोश भरने के लिए साथ में कैलाश खेर और बाबुल सुप्रियो के गीत और संगीत भी था बाबा रामदेव बहुत आत्मविश्वास से संगीत के साथ अपने योग के 'स्टेप्स' मिलाते नजर आ रहे थे उन्हें पसीना भी आ रहा था, क्योंकि इस सबकी गति तेज रखी गई थी

अब रोज भी वे यही सिखाते हैं या क्या ये तो मैं नहीं देखती पर ये मुझे हाई इंटेंसिटी वर्क आउट जैसा लगा (इसमें बीचमें कुछ सेकंड कम गती की शारीरिक क्रिया भी नहीं थी) ये सब पश्चिमी ट्रेनिंग जैसा ही लग रहा था, पर उसमें एकदम से लम्बे समय तक इतनी तेज गति शायद नहीं रखी जाती

हाई इंटेंसिटी वर्क आउट में कुछ भी गलत नहीं है इससे कैलोरिज भी ज्यादा और जल्दी जलती है पर इस तरीके को योग के नाम पर दिखाना मुझे ठीक नहीं लगा पश्चिम की निंदा और अपनी परम्पराओं की अंध प्रशंसा पर ही कितने ही बाबा लोग और राजनेता लोकप्रिय हुए हैं, तो अब ये विचित्र बदलाव क्यों? हम चाहे पश्चिम से सीखें या पूर्व से, पर जिससे ज्ञान मिला है उसके प्रति गुरुभाव का होना तो हमारी संस्कृति है न?

कसरत के लिए संगीत का साथ भी गलत नहीं पर योग की कुछ मूलभूत बातें छोड़ने पर योग कुछ नहीं रहेगा योगासन से मन अंतर्मुख होता जाता है तो उसे तेज संगीत के साथ कैसे करें? हाई इन्टेसिटी वर्क आउट में संगीत मनमें उत्साह भरता है और हम तय रूटीन को थकावट महसूस किए बिना कर सकते हैं पर आसनों में कुछ ध्यानासन भी हैं तेजी से चल रहे संगीत के साथ क्या आप ध्यान कर सकते हैं? तेज गति से आसनों के पुनरावर्तन करके एकदम से मनको प्राणायाम में 'स्विच' कैसे कर सकते हैं?

योगासन के विषय में यथार्थ सीख:

भारत में वर्षों से योगासनों का प्रचार हो रहा है मैंने जो योगशिक्षा वर्ग किया था उसका नाम योग-सौरभ था, सुमति नाइकजी हमें सीखाती थी ये वर्ग तब होता था जब बाबा रामदेव के कार्यक्रम टीवी पर आने शुरू नहीं हुए थे योग के प्रसार के लिए उन्होंने रिटायरमेंट के बाद अपने घर में ही योग के वर्ग शुरू किए थे प्रत्येक व्यक्ति की ओर उनका ध्यान होता था और हर आशंका पर उनसे चर्चा भी हो पाती थी मेरी शिक्षिका ने बहुत अच्छी एक शिक्षा दी थी, हर आसन को करते समय शरीर में जहाँ तनाव होता है, दर्द महसूस होता है उसका अनुभव करना चाहिए उस अनुभव के लिए जल्दी जल्दी आसन बदलने नहीं चाहिए, ऐसा उनका मत था इसलिए उनसे योग सीखना शांतिदायक बना था और थोडेसे लोग होने के कारण किसी के आसन में गलती होनेपर वे सही पद्धती समझाती थी उन्होंने एक एक आसन अपना बहुत समय देकर सिखाया था प्राणायाम में भी प्राणायामों के विविध प्रकारों आवश्यकता / अनावश्यकता होती है

उच्च रक्तचाप जैसी बीमारी से ग्रस्त लोगों को 'विपरीत करणी' अर्थात शीर्षासन, सर्वांगासन नहीं करने चाहिए। इसी तरह से हृदयरोग और अन्य रोगों के कारण भी कुछ योगासनों के अभ्यास में कुछ मर्यादा आ जाती है। इसलिए एक ही तरह का योग हर उम्र के हजारों लाखों लोगों के लिए कैसे उचित हो सकता है? बाबा रामदेव मुश्किल से मुश्किल आसन करके दिखाते हैं, वो क्यों मेरी समझ में नहीं आता? क्योंकि इस तरह से देखकर दो मिनट में कोई भी कठिन आसन सीख नहीं सकता। बाद में भी सीखना चाहे तो किसी के मार्गदर्शन बिना सीखना संभव तो होगा नहीं, फिर क्यों योग को सर्कस की तरह प्रदर्शित किया जाता है?     

योगप्रचार में भुलाया जा रहा अष्टांग योग:

अब योग के नाम पर जो प्रचार हो रहा है वो कितना सही है और कितना गलत ये समझने के लिए आसन जिस योग का एक अंग है उसके बारे में लिखना आवश्यक होगा

योगासन हठयोग का एक अंग है हठयोग साधना का मार्ग है, मुक्ति और समाधी इसी जीवन में प्राप्त करने के लिए हठयोग को बहुत मुश्किल माना गया है क्योंकि इसमें सफलता के लिए कठोर नियमों का पालन भी आवश्यक माना जाता है, इसकी शिक्षा के लिए अनुभवी और सच्चे गुरू होने चाहिए आजकल हमारा जीवन इतनी भागदौड़ से भरा हुआ है कि चाहकर भी इतने मुश्किल मार्गपर चलना संभव नहीं लगता

अष्टांग योग में आठ अंग होते हैं और उन सबका अभ्यास करना एक लम्बा प्रवास है, साधना है
वे अंग है: १. यम २. नियम ३. आसन ४. प्राणायाम ५. प्रत्याहार ६. धारणा ७. ध्यान ८. समाधी

यम क्या होता है: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह 

मैं इस सबके विस्तृत अर्थ इस आलेख में नहीं लिखूँगी, मुझे सिर्फ इस ओर आपका ध्यान आकर्षित करना है कि योग के नामपर हमें कहीं भ्रमित तो नहीं किया जा रहा है

आसन अष्टांग योग का केवल एक अंग है सरकारी विज्ञापनों में आसन, प्राणायाम या जो कुछ भी योग के नाम पर चल रहा है उसीको योग बताया जा रहा है आश्चर्य की बात है कि षट्चक्र, उनका जागृत होना, ये सब भी इसी योग से होता है, ऐसा सरकारी विज्ञापनों में दिखाया जा रहा है

श्रद्धावान लोग टीवी पर ये इंस्टेंट योग करके अष्टांग योग का पालन हो गया ऐसा मानते हैं लोग भोलेपनसे और श्रद्धा से जो बताया जाता है उसपर विश्वास करते हैं, लेकिन सत्य बताना योग को प्रचारित करनेवालों की जिम्मेदारी है योगसाधना मार्केटिंग का विषय नहीं है जो कि १५ सेकंड के विज्ञापन से समझाया जा सके

आसनों से वजन कम हो सकता है, मन का उत्साह भी बढ़ सकता है पर ये साधना सिर्फ इसके लिए नहीं है बार बार छोटे छोटे फायदों में बसाकर योगसाधना का महत्त्व कम हो रहा है

इस तरह के प्रचार का दूसरा पहलु ये भी है, अगर मानवी जीवन में आत्मा परमात्मा का एकत्व समझना इतना ही आसान होता तो हमारे देश में और दुनियाभर में इतने संत नहीं हुए होते। मीराबाई, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, कबीर, स्वामी विवेकानंद,'काली काली' करके माँ काली के लिए मासूम बच्चे की तरह रोनेवाले रामकृष्ण परमहंस नहीं होते। संत ज्ञानेश्वर ने योगसाधना में कुण्डलिनी जागृती, षट्चक्रों का जागृत होना इस सबको बहुत ही सुन्दर शब्दों में विस्तार से वर्णन किया है. अगर १५ सेकंड का विज्ञापन योग समझा सकता है तो उनको ये सब करने की क्या जरूरत थी? सबके लिए अध्यात्म का एक ही मार्ग भी नहीं हो सकता

बाबा रामदेव को ये सब पता नहीं होगा ऐसा लगता तो नहीं। पर ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच पहुंचना हो तो फिर ऐसा कुछ करना पड़ता है जो सबके लिए आकर्षक लगे।

मैंने एक और दृश्य उसी योगा शो में देखा वृक्षासन बताते समय उसके फायदे निवेदक ने बताये जैसे वृक्षासन शरीर का बैलेंस बनाता है। और साथ में निवेदक ने ये भी बताया 'समत्वं योग उच्यते'। देश में समत्व फ़िलहाल बढ़ रहा है या कम हो रहा है ये तो हम देख ही रहे हैं। समत्व और योग इतना आसान होता तो १८ अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता का उपदेश नहीं देते। अर्जुन को सिर्फ वृक्षासन करने को कहते।

मैं योग को जितना समझने की कोशिश करती हूँ, उतना लगता है कि कुछ समझ में नहीं आता।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के प्रचार में देश के समस्याओं की अनदेखी:

योग दिवस के जोरों शोरों से प्रचार के लिए हैशटैग्स ट्विटर पर ट्रेंड किये जा रहे है. मैंने कुछ ट्विट्स 'योगाविदनमो' के नामसे पढ़ें. योगप्रचारकों कहना था कि योग से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है और कुछ और प्रचारकों का कहना था, हमेशा की तरह विरोधियों को गालियाँ योग से प्रचारकों का मानसिक विकास कितना हुआ है ये इन ट्विट्स से ही दिखा प्रचारकों का कहना है कि मोदीजी स्वयं रोज सुबह ४ बजे से योग, प्राणायाम भी करते हैं जो की प्रशंसनीय भी है।

पर विरोधियों को टारगेट करना, अभद्र भाषा में टिप्पणियाँ करनेवाली फ़ौज का समर्थन-सत्कार करना, उनको ट्विटर पर फॉलो करके उन्हें एक तरह से शाबाशी देना क्या योग के अनुयायी का लक्षण है? मोदीजी पर टिपण्णी लोग सह नहीं पाते पर अपने बर्ताव से अपने ही नेता का खंडन ना हो इतना तो ये लोग सोच सकते हैं मोदीजी प्रधानमंत्री हैं इसलिए उनके बारे में सवाल पूछे जाते हैं ये भी उन लोगोंको समझना होगा

ये किस तरह का योग है जिसके प्रचार की चकाचौंध में लोगों के दुःख दर्द और आंसूओ को दबाया/भुलाया जाता है।

मोदीजी ट्विटर पर रोज एक आसन सिखाने का वीडियो शेयर करते हैं।

आप कल्पना करें, उन बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की जिन्हें पानी के लिए दूर दूर तक भटकना पड़ता है, क्या वे ये आसन सीख पाएंगे? धुले में तो सूखा हो ना हो ४ दिन के बाद ही म्युनिसिपल कारपोरेशन का पानी मिलता हैं

आप कल्पना करें किसानों की जो क़र्ज़ में डूबे हुए हैं, उनके लिए योग दिवस महत्त्व क्या होगा

देशभक्तों को कैराना के पलायन की चिंता है पर महाराष्ट्र सूखे से विस्थापित हुए लोगों की चिंता क्यों नहीं?

महान अभिनेता नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने अपने 'नाम फाउंडेशन' के जरिये लोगों की मदद की। मुझे नहीं पता कि उन्होंने योग पर कितने भाषण प्रवचन दिए पर सूखे से झुलसे लोगों का दर्द समझा और उन्हें मदद की। 

पूरे देश की जिम्मेदारी कन्धों पर लेकर अपनी जनता के आंसू ना दिखे तो योग से आखिर कौनसा मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है?

छोटे छोटे बच्चे गर्मीयों की छुट्टियां मनाने के बजाय अपने नन्हें हाथों से छोटे छोटे बर्तनों में पानी भरने के लिए दूर दूर तक घुमते हैं वो भी तपती धुप में। कुछ बच्चे तो गर्मी से मृत्यु को प्राप्त हुए।


देश की इस गंभीर स्थिति को जानकर भी किसीकी आँखों में आंसू ना आये, तो योग, आसन, और प्राणायाम सब व्यर्थ हैं। देशभक्ति और अपनी संस्कृति का बखान व्यर्थ है।

ट्विटर पर: @chaitanypuja_