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06 फ़रवरी 2016

महाभारत के प्रति अकारण भयजनित परम्परा

पिछले दो आलेखों में अविवेकी परम्पराओं के कारण हमारी किस तरह हानि हो रही है, ये हमने देखा। इसी विषय में आज महाभारत के प्रति प्रचलित परम्पराओं के बारे में आलेख।

महाभारत, रामायण, दुर्गासप्तशती, गरुड़पुराण जैसे महान ग्रंथों के बारे में भय निर्माण करनेवाले मत देखे जाते हैं

रामायण, महाभारत और पुराणों का उद्देश्य व्यक्ति और समाज का आदर्श जीवन कैसे हो, राजनीती, युद्ध के नियम कैसे होते हैं इसका वर्णन दीखता है। और सबसे मुख्य मार्गदर्शन जो मुझे समझ में आता है वो अध्यात्म की दृष्टि से है। पर फिर भी इन ग्रंथों के प्रति भय क्यों है ये समझना मुश्किल है।

भय और अंधश्रद्धा: महाभारत घर में रखने से भाई भाई के बीच लड़ाई होती है।


महाभारत के पूरे ग्रन्थ का अर्थ केवल युद्ध समझा जाता है जो की कौरव और पांडवों के बीच हुआ था। कौरव और पांडव भाई थे और समझा जाता है, एक दुसरे का वध करने के लिए उन्होंने युद्ध किया. इतना ही सार महाभारत का माना जाता है।
इसलिए महाभारत को घर में रखने से भाई-भाई के बीच लड़ाई होने लगती है ऐसी अंधश्रद्धा देखने में आती है. महाभारत घर के बाहर शायद किसी मंदिर में पढ़ सकते हैं। इस नियम में महिला-पुरुष भेद नहीं है।

मेरे पास गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित और अनुवादित महाभारत के सारे खंड हैंइसलिए मुझे भी ये सलाह मिली थी कि इन ग्रंथों को घर से निकाल दूँ। मुझे बहुत दुःख हुआ। महाभारत को घर में रखने से बहुत संकट आते हैं ऐसा भी सुना। सबकी जिन्दगी में अच्छा बुरा समय आता है, उतार-चढाव आते हैं। इसमें कोई ग्रन्थ कैसे कारण हो सकता है? वो भी बिना पढ़े सिर्फ घर में रखने से ही अनर्थ होगा ये परंपरा अज्ञान ही है। किसी पुस्तक को पढने के बाद उसमें से क्या अर्थ हम ग्रहण करते हैं और हमारी उसपर हमारा वर्तन कैसा हो ये सब व्यक्ति व्यक्ति पर के लिए अलग हो सकता है और उसका स्वातंत्र्य भी हर व्यक्ति के पास है।

दुःख दो बातों का हुआ एक तो महाभारत का इतना बड़ा अपमान और इस महान ग्रन्थ के प्रति इतना भय। और दूसरा दुःख ये कि एक ओर तो धर्म का कोई मजाक उडाए तो हमें बहुत बुरा लगता पर इस तरह की बातों को श्रद्धा से माना जाता है। महाभारत से भय मानना और इस ग्रन्थ को घर में नहीं रखना, ये तो भगवान श्रीकृष्ण से भय मानना है ये उचित कैसे हो सकता है?

महाभारत: अध्यात्म और आदर्श जीवन का पथप्रदर्शक ग्रन्थ


महाभारत में श्रीमद्भगवतगीता है साक्षात् श्रीकृष्ण ने बताया ज्ञान, कर्म और भक्ति योग का अमृत है। उस महाभारत को घर में रखने से किसीका क्या बुरा हो सकता है? ये कौनसा धर्म है? ये कैसी श्रद्धा है? ये कैसी भक्ति है? लगता है कि ऐसी बातें फ़ैलानेवाले लोगों ने महाभारत को पढ़ा नहीं होगा। पढ़े लिखे युवा भी डर के मारे महाभारत से दूर रहते हैं।महाभारत को सिर्फ एक ग्रन्थ समझकर पढ़ा जाए या केवल कविकल्पना मानकर देखा जाए, तब भी महाभारत से ज्ञान ही प्राप्त होनेवाला है। महाभारत में कुछ ना कुछ ज्ञान सबके लिए उपयुक्त है।

महाभारत भाई-भाई के बीच की लड़ाई नहीं है ये धर्म और अधर्म के बीच की लड़ाई है। अगर अपने गुरू, पूजनीय लोग, ज्येष्ठ, वरिष्ठ अधर्म की राह पर चलें तो उनके विरुद्ध भी आवाज उठानी चाहिए, ऐसा विचार मेरी समझ में आता है। आज के समय के हिसाब से मुझे ये विचार न्याय की दृष्टि से आदर्श लगता है।

आज के दौर में तो अपने पसंदीदा नेता की चापलूसी करना, उनकी गलतियाँ छुपाना और विरोधी मतों का अभद्र भाषा में अपमान करना न्याय-अन्याय और उचित-अनुचित के विवेक को अनदेखा कर किया जाता है। ऐसे में स्वार्थ, द्वेष, अन्याय और अधर्म बढ़ता है। महाभारत में अधर्म के विरूद्ध बोलने की प्रेरणा मुझे दिखती है।

महाभारत की विशेषता: 


महाभारत में केवल युद्ध की ही चर्चा नहीं है। ययाति का पुरु को उपदेश, भगवान दत्तात्रेय का यदु को उपदेश, द्रौपदी की योग्यता और द्रौपदी द्वारा राज्य की संपत्ति का व्यवस्थापन, सावित्री की स्वतन्त्र बुद्धि और क्षमता, कृष्ण की नीति, उनका प्रेम और सत्यनिष्ठा, ये सब मनन चिंतन करनेयोग्य है।

प्रेम की गहराई और विरह वियोग का दुःख इनपर नलदमयंती, रुरु-प्रमद्वरा, शकुंतला और दुष्यंत की कथाएँ कितनी सुन्दर हैं। ये अजीब बात है कि इन कहानियों को सिर्फ बच्चों की कहानियां बनाकर बच्चों के लिए लिखा जाता है।

महाभारत की सबसे महत्त्वपूर्ण बात मुझे ये लगती है कि ये किसी को बड़ा करके दिखाने के लिए या किसी को छोटा करके दिखाने के लिए नहीं है। ग्रन्थ को पढने के बाद महाभारत में वर्णित लोगों और घटनाओं के बारे में मत हम अपने विचार से बना सकते है।कोई भी विचार महाभारत में थोपा गया नहीं है।

महाभारत पढना क्यों आवश्यक है?


१. महाभारत पढने के बाद लोग अपने जीवन के लिए ग्रह, नक्षत्र, तरह तरह के योग जैसे कालसर्पयोग, विभिन्न प्रकार की शांतियाँ वगैरह छोड़कर अपने कर्मों पर ही विश्वास करने लगेंगे. इससे अंध परम्पराओं में व्यर्थ होनेवाला, समय और अर्थ सत्कर्मों में अपने और समाज के हित में लगाया जा सकता है।

२. भय से मुक्त मन की कार्यक्षमता बहुत बढ़ जाती है, जिससे वास्तविक सफलता और शांति का अनुभव होता है।

३. आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग आसान लगने लगेगा

४. महाभारत पढने के बाद पौराणिक ग्रंथों के प्रति जो भ्रामक कल्पनाएँ फैलाई जाती हैं, उनका खंडन किया जा सकता है। धर्म का मजाक उड़ाए जानेपर नफरत का विरोध करने के लिए नफरत और विष का जवाब विष से ही देने से बजाए तर्क और विवेक से खंडन किया जा सकता है।

५. स्त्रियों का और जातियों के नामपर मनुष्यों का भारत में हमेशा से ही शोषण होता आ रहा है ये मत पूरी तरह से उचित नहीं लगता, ऐसा रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थ पढने से भी समझ में आता है।
६. काफी परम्पराएं बेवजह शुरू हुई और अन्याय का कारण बनी ये जानकार उन्हें छोड़ना भी आसान लगेगा।

 परम्पराओं के विषय में चैतन्यपूजा में पोस्ट: