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16 नवंबर 2015

वेदना: हार या जीत...मासूमों की जान जाती है

दुनियाभर में अलग अलग कारणों से चल रहे हिंसाचार से रक्तपात, आँसू, आक्रोश हमें रोज देखने को मिलता है. ये सब रोका नहीं जा सकता ऐसा समझकर जिन्दगी और दुनिया के प्रवाह के साथ ही बहते रहना होता है. इसी दुःख पर कुछ पंक्तियाँ...

युद्ध नीतियां चलती रहती हैं
मासूमों की जान जाती है
कभी खुली तो कभी छुपी
कभी आर्थिक तो कभी धार्मिक
युद्धनीतियां चलती रहती हैं
मासूमों की जान जाती है

कभी आतंकवाद तो कभी चरमपंथ
कभी वंशवाद तो कभी शांति के लिए ही युद्ध  
कठपुतलियाँ बनती रहती है
इस्तेमाल होती रहती हैं
आग सुलगती रहती है
नचानेवाले कोई और होते हैं
मारनेवाले कोई और
और मरनेवाले मासूम!
किसी के खेल के लिए
आग सुलगती रहती है
पैसा घूमता रहता है
इमानदारी से या बेईमानी से
अलग अलग नामों से
अलग अलग रूपों में
पैसा घूमता रहता है
काला या सफ़ेद
वस्त्र पहनता रहता है
पैसा घूमता रहता है
कहीं नफरत का जहर बनकर
कहीं शांति का दूत बनकर
काम करता रहता है
किसकी जीत और किसकी हार
मानवता और अमानुषता का युद्ध चलता रहता है
कहीं मासूमों की जान जाती है
कहीं मासूम जान बचाने आते हैं
कहीं दिलों में नफरत की आग भड़कती रहती है
कहीं प्यार बसानेवाले आते हैं
जहाँ युद्धनीतियां
सत्ता के खेल    
मानवता की हत्या होती रहती है
वहीं  
प्रेम की रीतियाँ
शांति की चाह
लिए दिल जन्म लेते रहते हैं 


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