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07 अक्तूबर 2015

क्या 'मानवता' मात्र एक शब्द बनकर रह गया है?

दादरी में अफवाह पर हत्या की घटना और उसपर स्वार्थ की घृणित राजनीती पर यह आलेख 


दादरी की बर्बर हत्या और उसके बाद की राजनीती दोनों ने नि:शब्द कर दिया है|

यह सब क्या हो रहा है?

भीड़ किसी के घर में घुसकर उसकी पीट पीट कर हत्या करने तक घटना हो जाती है| क्या कानून और प्रशासन का भय क्या अपराधियों के मन में नहीं रहा? क्या अपराधियों के लिए घिनौने से घिनौने अपराध करना इतना सहज हो गया है?

उत्तर प्रदेश के हालात के बारे में अलग से लिखने की आवश्यकता ही नहीं|


चुनाव जीतने के लिए कुछ भी!


दादरी की घटना के बाद राजनीती का घृणित चेहरा हर दिन सामने आ रहा है|
बिहार के चुनाव के लिए सब एडी चोटी का जोर लगा रहे हैं| चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार है|

ट्विटर से लेकर वास्तविक जीवन तक लोग अपनी अपनी पार्टी के लिए सुबह से शाम तक एक दुसरे से लड़ने के लिए तैयार हैं| 

किस हद तक? 

किसी भी हद तक!

चुनाव प्रचार के लिए नए नए (और गिरे हुए कहूँ तो अनुचित नहीं होगा) हथकण्डे अपनाए जाते हैं, जिनके सही या गलत होने और जिनके दीर्घकालीन परिणामों बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता|

क्या चुनाव आयोग चुनाव अभियानों के गिरते स्तर पर नियंत्रण नहीं ला सकता?

मैं शाकाहारी हूँ और गोमांस तो क्या, अपने खाने के लिए किसी भी प्राणी की हत्या करना मुझे उचित नहीं लगता| हमारी संस्कृति के अनुरूप गाय को माता मानना और उसकी पूजा करना यह मुझे बिलकुल उचित और आवश्यक लगता है| गोहत्या न हो, गोमांस निर्यात न हो यह भी मुझे उचित लगता है| 

लेकिन, अखलाख की हत्या और उसपर घृणित राजनीती ने 

मेरा सर शर्म से झुक गया है|

शाकाहार को सात्विक माना जाता है और शाकाहारी सात्विकता के लिए शाकाहार ज्यादा अच्छा मानते हैं| क्या गोमांस खाने की अफवाह पर किसी की हत्या करना यह सात्विक व्यवहार हुआ? 

क्या हम जिस सहिष्णुता और विशाल हिन्दू संस्कृति की उदारता को प्रचारित करते हैं, उसके अनुरूप यह सब हो रहा है? 

स्वार्थपरायणता में भुलाई गई मानवता 


दादरी की हत्या का बहाना लेकर सारे हिन्दुओं को और उनकी श्रद्धाओं को बदनाम करने का, बार बार अपमानित करने का अच्छा मौका हाथ लगा है, ऐसा जो समझ रहे हैं वे भी अखलाख की हत्या पर रोटियाँ सेंकते दिख रहे हैं| यह पीड़ित परिवार के दुःख पर अन्याय की चरमसीमा हुई|

अलग-अलग क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोग जिनपर आम जनता विश्वास करती है, अपनी राजनैतिक निष्ठा और अपनी निष्ठा को होनेवाला फायदा या नुकसान सामने रखकर ही इस घटना पर प्रतिक्रिया दे रहे दीखते हैं|


क्या हम सब के लिए 'मानवता' सिर्फ एक शब्द बनकर रह गया है?

या इसका अर्थ अपने स्वार्थ और फायदे के अनुसार बदलता है?