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31 अगस्त 2015

कविता: हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है...

आजकल हत्याएँ बहुत चर्चामें है| कोई लेखक की हत्या कैसे कर सकता है? कोई माँ अपनी बेटी की हत्या कैसे कर सकती है? पर उन हत्याओं के बारे में मुझे कोई टिप्पणी नहीं करनी है| मुझे तो उन हत्याओं के बारे में बात करनी है जो रोज हमारे सामने होती है| वैचारिक हत्या! आत्मा की हत्या!
हमें किसी भी बारे में प्रश्न करने की आदत नहीं होती| जो सिखाया जाए वैसे ही जीना है| और सीखानेवाला भी कोई भी हो सकता है...इतना हम अपने आप को कमजोर रखते हैं| इतनी बड़ी-बड़ी हत्याओं की घटनाएँ हम रोज पढ़ते हैं| इनके पीछे कितनी बड़ी योजना हो सकती है, कितने ही लोग इनमें जुड़े हुए हो सकते हैं| कोई किसी पर नजर रखता है, किसी की आदतों की जानकारी रखता है, किसी के घुमने फिरने के समय की जानकारी रखता है| यह सब समाज के सामने ही तो होता है| कितने लोग प्रश्न पूछते हैं? १००-२०० रूपयों के लिए लोग अपने आपको बेचने के लिए तैयार रहते हैं...और जो काम वो कर रहे हैं,  किसी बहुत बड़े अपराध की नीव हो सकती है यह सोचने तक की फुर्सत उनको नहीं होती| गरीबी का तर्क यहाँ उचित नहीं होगा, क्योंकी  भ्रष्ट जीने की यह आदत हर वर्ग में है|  कोई प्रश्न करे तो उसका मुँह बंद कर दिया जाता है| आजकल भ्रष्टाचार इतना अन्दर तक फ़ैल चुका है कि लोगों को लगता है, सब कुछ खरीदा जा सकता है| पैसे से, पद या सत्ता से हर अपराध दबाया जा सकता है|  क्योंकी शायद अब हमारी आत्मा ही मर चुकी है...

हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है
विचारों की, 
भावनाओं की,
शब्दों की, 
हररोजही...
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है

कल्पनाओं की, 
स्वातंत्र्य की, 
सृजनात्मकता की, 
हररोजही...
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है

अस्तित्व की, 
अस्तित्व के पंखों की, 
निर्भयता से जीने के अधिकार की, 
हररोजही ...
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है


संवेदनाओं की, 
आस्थाओं की, 
भक्ति की, 
ध्येय, तत्त्व और निष्ठा की भी, 
हररोज ही ... 
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है

हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है
चलते-फिरते समाज के आत्माकी, 
सत्य के लिए खड़े रहनेवाले आत्माकी, 
न्याय के लिए लड़नेवाले आत्माकी, 
हररोज ही ...
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है


न किसी को इससे कल फर्क पड़ा था ,
न आज पड़नेवाला है 
अपने मृत आत्मा को ढोनेवाली 
इन चलती फिरती लाशों के लिए 
हत्याएँ तो हररोजही होती रहती है ...

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