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02 जुलाई 2015

कविता: अनकही भावनाएँ

आज की कविता का विषय है, 'अनकही भावनाएं' बहुत बार ऐसा होता है कि हम वह बात नहीं कह पाते जो हमारे मनमें है और कभी कभी तो जिंदगीभर कह नहीं पाते वह बातें, सुख-दुःख की भावनाएं कहीं न कहीं अन्दर ही दबी रह जाती है इसी विषय पर एक काव्यात्मक कथा..

काश कभी मैं बात कर पाती
अपना दर्द तुमसे बाँट पाती

कितनी बाते करते थे लेकिन
दिल की बात न कह पाई
यह दर्द तुम सह न पाते
इसलिए कुछ बोल न पाई
मेरी लड़ाई, मेरा दर्द
तुमसे नहीं बाटना था
पर तुम नाराज हो गए
कि मैं क्यों न मिल पाई
काश तुम होते मेरे साथ
मेरा दर्द बस सुनने के लिए
थोड़ी तो शक्ति रहती मुझमें
यह लड़ाई लड़ने के लिए
थोडासा विश्वास अगर मुझपर करते
थोडीसी मजबूरी मेरी समझते
जिन्दगी कितनी आसान होती
हम दोनों के लिए
मैं तो फिर भी चलती रहूँगी
अपनी लड़ाई खुद ही लडूंगी
पर  तुम साथ होते तो
हर मुश्किल आसान थी
मिले न मिले हम कभी जिन्दगी में
आस टूट रही है अब जलते ख्वाबों में
काश मेरी आवाज कभी तुम सुन पाते
काश एक ही रास्ते पर कभी हम चल पाते
अनकही भावनाएँ अपने दिल की 
काश मैं कभी तुमसे कह पाती 

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