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15 मई 2015

कविता: बूंदों का युद्ध

परसों अचानकसे तेज हवा चलने लगी, बादल गरजने लगे और बारिश हुई मुझे बहुत मजा आया गर्मी से राहत भी मिली इस सुंदरसी वर्षा पर मराठी में मैंने "थेंबांचं युद्ध" कविता ब्लॉग पर पोस्ट की थी, उसीका हिंदी रूपांतरण यह कविता पढ़कर आपको जरूर बचपन याद आ जाएगा  

काले काले
बादलों का आक्रमण

आज हुआ
निले निले
आसमान पर

क्रूर क्रुद्ध
सूरज की किरणोंसे
लड़ने के लिए
काले काले बादलों का
आज हुआ आक्रमण

तप्त  धरती को छुड़ाने
गर्मी के कहर से
काले काले बादलों का
आज हुआ आक्रमण

जोरदार चली हवा
सारथ्य करने बादलों का
शंख बजाके बादलोंने
उद्घोष किया युद्धका

मेघगर्जना भयंकर
युद्ध के प्रचंड स्वर
सुनतेही धूप को पसीना आया
भय से कांपते किरणों का शस्त्र गिर गया

दामिनी का अस्त्र
छूटा तीव्र सूरज पर
पराजय के भय से
सूरज मुंह छुपाए कहीं पर

बूंदों का सैन्य
विजय से उन्मादित
धरती उन्हें देख
हो गई आल्हादित

पंछी बन गए सारे दूत
समर की कथा सुनाते अद्भुत 
क्षण में उड़े क्षण में बैठे
चहक चहक कर
वर्षा का सुनाते विजय गीत 

बड़ी बड़ी
बूंदों के वार
मैंने भी मनाई
ख़ुशी की जलधार


ऊष्मा से तप्त
आक्रोशित मन
वर्षा में नाचे
लेकर बूंदों का धन


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