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26 फ़रवरी 2015

कविता: एक नयी कोशिश ... हर दिन!

भावनिक अत्याचार के विषय पर आज की कविता! 


भावनिक अत्याचार (Verbal and Emotional Abuse) पर मैं कुछ दिनों से लिख रही हूँ | आज की कविता इसी कड़ी में! इस विषय पर बहुत जानकारी, आलेख इन्टरनेट पर हैं, पर होता यह है की जो पीड़ित होतें हैं उनकी समस्या, या व्रण दिखाई नहीं देते| और जो दीखता नहीं उसकी चर्चा भी नहीं होती | 

इसीलिए एक तरह से दुर्लक्षित होने के कारण इस विषय पर अधिक लिखने की प्रेरणा मुझे मिलती है| किसी प्रिय व्यक्ती, परिवार की कोई व्यक्ति, दोस्त, या रिश्तेदार या जीवनसाथी, कोई भी यह कर सकतें हैं, शाब्दिक और भावनिक अत्याचार उपरसे दिखतें नहीं और वह होतें हैं तो पता भी नहीं चलता |

घर में, रिश्तों में जो भावनिक अत्याचार होतें हैं उनसे पीड़ित व्यक्ति बाहर नहीं निकल पाती | क्योंकी कुछ केसेस में अत्याचार करनेवाले उन्हें आर्थिक दृष्टिसे असहाय्य कर देतें हैं | और बार बार की अपशब्द, अपमानजनक बर्ताव, दोषी ठहराना  इससे पीड़ित व्यक्ति का आत्मविश्वास खोता चला जाता है| और वे वास्तव में अपने आप को समस्याओं के लिए दोषी मानने लगतें हैं, अपराधबोध से ग्रस्त होतें हैं; चिंता से ग्रस्त होतें हैं|

इस तरह से समस्याओं के दुष्टचक्र में नयी समस्याएँ पनपने लगती हैं | बाहर से सब कुछ ठीक दीखता है पर अन्दर एक तूफान चल रहा होता है |
सकारात्मक टिप्पणी के नामसे बातों ही बातों में शाब्दिक अत्याचार होता रहता है | और पीड़ित व्यक्ति को लगने लगता है की मैं एक अयशस्वी व्यक्ति हूँ, जो यही अपमानजनक बर्ताव पाने के लायक है|  

दोस्त दोस्ती के नाम पर, मजाक के नाम पर बार बार अपने ही दोस्त को अपमानित करतें रहतें हैं |

माता-पिता बच्चों को सुधारने के नाम पर बार बार उनको यह जताते दिखतें हैं की वह कितने मूर्ख हैं, अयोग्य हैं |  

ऐसे कितने ही उदहारण हम अपने आसपास देखतें हैं लेकिन यह सब ऐसाही तो होता है...ऐसा हम सोचतें हैं |

माता-पिता को, दोस्त को या जीवनसाथी को या कोई हमसे उम्र में बड़ें हो तो उन्हें तो बोलने का अधिकार है ही ऐसा माना जाता है |

मुझे यह अनुचित लगता है, कोई छोटा बच्चा ही क्यों न हो, सम्मान पाने के योग्य है| सभ्यता तो यही है की हम सम्मान और प्रेम से बात करें और प्रेम से ही हर रिश्ते को निभाए |  

भावनात्मक अत्याचार समझ में आने के बाद भी इस सब से बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है, जब पीड़ित इस सबसे छूटने के कदम पर आता है, तब अत्याचार करने वाले, वही अपने, झूठा प्यार दिखाके, रोकने लगते हैं |

ऐसे हालात में, जिस व्यक्ति पर यह गुजर रहा होगा, वह कैसे सोचतें होंगे....   

यही अभिव्यक्त करने की मैंने इस कविता में कोशिश की है,


हर दिन एक नयी कोशिश
हर दिन एक नयी मुस्कान
कल के आँसू भूलकर
जीने की
जिन्दा रहने की
मुस्कुराने की
एक नयी कोशिश
हर दिन एक नयी कोशिश
नफरत को प्यार से मिटाने की
जहर को प्यार का अमृत देने की
कल के जख्म छुपाकर
चेहरे पर मुस्कान पहनने की
हर दिन एक नयी कोशिश
एक नयी सफल कोशिश
अपने घाव छुपाने की
एक नयी कोशिश
ना मैं हारती हूँ
न वोह
न हालात!
और न मेरी किस्मत!
मैं लडती हूँ जीतने के लिए!
एक नयी कोशिश हर दिन
जीतने के लिए !
जीने के लिए!
इस गम को मिटाने के लिए
किस्मत को मेरी हाँ! मैं ही लिखती हूँ!
पर जहर को भी तो गले लगाती हूँ!
अमृत से जहर बदलने कि कोशिश करती हूँ
हर दिन
हर दिन एक नयी कोशिश करती हूँ!
इस नफरत से जान बचाने की
करती रहती हूँ
हर दिन एक नयी कोशिश!
कोई साथ दे न दे!
कोई यह दर्द समझे न समझे
कृष्ण के प्यार से
कृष्ण की शक्ति से
हर दिन जीती हूँ
किसी और को
मुस्कुराकर
मेरी मुस्कान ढूँढती हूँ
एक नयी कोशिश करती हूँ
हर दिन एक नयी कोशिश!
आगे क्या होगा?
मैं बहुत डरती हूँ!
ये आँसू कहीं बोल न पड़े
इसलिए दुनिया से दूर रहती हूँ!
मेरे सपने, मेरी जिन्दगी,
वापस लेने की
एक नयी कोशिश करती हूँ!
हर दिन एक नयी कोशिश !
उजाला क्या होता है
मैंने तो इस पिंजरे कि  
खिड़की से ही देखा है
जिन्दगी क्या होती है
यह सिर्फ मेरे
सपनों में ही देखा है !
मेरे प्यार को पाने की
फिरसे हर दिन
हर सुबह
एक नयी कोशिश करती हूँ!
एक नयी कोशिश!
हर दिन एक नयी कोशिश!


मैं कृष्ण के बारे में सोचती हूँ, इसलिए कहीं न कहीं उम्मीद और सकारात्मकता मेरी कविता में आती है | पर वास्तव में भावनिक शोषण के शिकार व्यक्ति का जीवन उजड़ जाता है| और वे यह बात कभी नहीं बोलतें इसलिए ये जख्म अँधेरे में ही रहतें हैं | 

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