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28 नवंबर 2014

कविता: ठण्ड ठण्ड ठण्ड


खुबसूरत सी ठण्ड शुरु हो गयी है, और मुझे यह ठण्ड बहुत प्रसन्न करती हैं क्योंकी हमारे यहाँ साल के अधिकतर समय गर्मी ही बहुत होती है | 

ठण्ड के नाम कुछ पंक्तियाँ..  


ठण्ड ठण्ड ठण्ड
सुबह शाम दिन रात

केवल
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
धुप मे भी
छाँव मे भी
शहर मे
गाँव मे भी
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
अन्धियारी रात में
खिलखिलाती सुबह में
आजकल तो बस
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
चाय काफी की लत बढ़ानेवाली
और
व्यायाम की आदत छुड़ानेवाली
यह
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
सपनों की गहरी नींद सुलानेवाली
और सुबह देर तक
खुलती आँखों को
फिरसे सुलानेवाली
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
आजकल तो बस
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
काम न करने के
बहाने बतानेवाली
और
आलस्य को प्यारसे
सहलानेवाली
यह प्यारी
ठण्ड ठण्ड ठण्ड
इतनाही नहीं.....
कविकल्पनाओं में रातदिन
रमानेवाली...
प्यारीसी हसती मुस्कुराती
थोडीसी शरारती
ठण्ड ठण्ड ठण्ड

वैसे मैं बिलकुल भी आलसी नहीं हूँ|देखिए ना, उँगलियाँ चलने को तैयार नहीं फिर भी यह कविता पोस्ट की है...:-)

और हाँ..

मुझे चाय काफी की लत बिलकुल नहीं है, बस यह कविता लिखते हुए थोडीसी काफी ले रही हूँ...;)

2 टिप्‍पणियां:

  1. ठण्ड भले ही हो लेकिन काम तो करना ही पड़ता है .....और काम करते हुए ठण्ड का आभास ही नहीं होता ...
    बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. हाँ यह तो सच है, काम तो करना ही पड़ता है, ठण्ड साथ हो तो मुझे मजा आता है| धन्यवाद कविताजी. :-)

      हटाएं

चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!