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04 नवंबर 2014

प्यार भी अजीब पागल है...

प्रेम में पागल प्रेमी क्या क्या सोचतें है, लोग उन्हें बिलकुल पागल मानतें हैं पर उस पागलपन में वो कितने खुश हैं यह तो वही जाने....

ऐसीही कुछ सुंदर, प्यारीसी और मीठीसी भावनाओं पर यह काव्य,

प्यार भी अजीब पागल है 
क्या क्या खयाल दिल में लाता है 

उसकी याद आए तो दिल कहता है 
वह ठीक तो होगा न ?...
हाँ! धडकता दिल कहता है 
वह ठीक तो होगा न...
उसकी याद न आए तो 
पागल दिल रोता है..
वह ठीक तो होगा न..
विरह का यह दर्द 
सहना कितना मुश्किल है 
लेकिन
यह पागलपन जीना कितना मीठा है...
एक पल का भूलना जैसे जान ले लेता है 
लेकिन इस दर्द में जीना 
फिरभी अच्छा लगता है...
पागलपन है यह 
दिल चुपकेसे कहता है 
लेकिन फिरभी यह 
इतना मीठा क्यों लगता है?
क्या है अंजाम याद करने का 
या फिर उसे भूल जाने का...
पागलपन ही तो है यह 
लेकिन फिर भी इतना मीठा सा क्यों है? 
कोई समझाए 
समझता नहीं है दिल..
किसलिए तेरा यह पागलपन है 
सुनता नहीं है दिल...
आशा - निराशा दोनों खुशी देती है 
ऐसा अजीब है यह पागलपन 
हाँ! समझाया नहीं जा सकता है 
लेकिन फिर भी बहुत मीठा है 
यह पागलपन 
कुछ सपना अधुरासा 
कुछ विश्वास आँखों में 
जिन्दा रखता है यह पागलपन 
और वह दर्द बिछड़ने का 
जीने नहीं देता एक पलभर 
यह सुख है या दुःख 
यह समझना भी मुश्किल है 
यह राह है ऐसी अनजानीसी 
इस पर चलना भी एक पागलपन है 
हाँ! यह प्यार ऐसाही 
बिलकुल अजीब 
बिलकुल पागल है...
सागर जैसा गहरा है यह 
न इसका कोई अंत दिखता 
न दिल इसे कहीं 
रोकना चाहता 
बस्...पागलपन में डूबके 
अपने ही ख्यालों में 
मस्त मगन रहता...
क्योंकी 
यह प्यार ही अजीब पागल है...
हाँ! यह प्यार ही अजीब पागल है...
                                   ... मोहिनी 

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