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23 जून 2014

आंदोलनों की दिशा और सार्थकता – चिंतन

पिछले करीब दो ढाई वर्षों से सोशल मिडिया के माध्यम से लोगों से बहुत चर्चा करने  का अवसर मिला पिछले दो-तीन वर्षों में सशक्त आन्दोलन भी हुए है परन्तु पिछले कुछ दिनों से एक विचार मन में आ रहा है, विविध आन्दोलनो  की दिशा कितनी सही है? क्योंकी ऐसा देखने में आया है, की  आंदोलनों में गहराई से समस्या के मूल में जाने का प्रयास नहीं होता, लोग एक ही समय पर परस्परविरुद्ध विचारों का स्वीकार करके के वह जीने का और औरों को सीखानेका प्रयास करतें हैं – ऐसे विचित्र प्रयास में आन्दोलन पराजित होता है – (नेता शायद जीत भी जातें होंगे) ऐसे ही कुछ मुद्दों की चर्चा इस आलेख में है