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03 अप्रैल 2014

मुखवटों की दुनिया

आज का काव्य आज की राजनीती और चुनावी गर्मी में बदलते रंग और मुखवटों के ऊपर हैं|

मुखवटों की दुनियामें खड़ी अजनबीसी
अकेली हूँ आज मैं, बन गई बेजानसी

अच्छा बुरा जैसा भी हो मेरा एक चेहरा है
पर जहाँ भी देखूं आज एक नया मुखवटा है
अजनबीसा लगता है आज हर चेहरा
क्योंकी हर दिन उनका होता है कुछ नया मुखवटा
रंग भर दिए जातें हैं हर मुखवटेमें
और सबसे सुन्दर उसे बनाया जाता है
उस मुखवटे की भक्ति करने के लिए
और नए मुखवटें बनाएँ जातें हैं
मैं जहाँ भी मुडती हूँ बात करने के लिए
वहाँ एक मुखवटा नजर आता है
भय लगता है कभी कभी
क्या मेरा चेहरा भी बदल गया है?
क्या मैंने भी मुखवटा पहन लिया है
या  मुझे भी मजबूर किया जा रहा है
मुखवटा पहनने के लिए
घृणा आती है ऐसी राजनीती से
घृणा आती है इन मुखवटोंसे
हे प्रभो! अकेली भी रह जाऊं इस भीड़में
तब भी दुःख नहीं होगा, खेद नहीं होगा
पर मुझे कभी मुखवटों की दुनिया का हिस्सा नहीं बनना 
अच्छा बुरा जैसा भी हो,
‘मेरा चेहरा नहीं खोना
मेरा चेहरा  नहीं खोना’     
तुम भगवान हो, क्योंकी
तुम हो सत्यस्वरूप
हे प्रभो! मुझे सत्य से बिछड़ने न देना
तुमसे अलग मत करना
मेरा चेहरा मुखवटों की दुनिया में
कभी खोने मत देना...


चुनाव के आतेही राजनेता एक साथ अलग अलग परिस्थिती के लिए, अलग अलग मतदाता समूह को आकर्षित करने के लिए विभिन्न मुखवटें पहन लेतें हैं | विचारधारा और पक्षनिष्ठा जैसे शब्द आजकल बीते ज़माने के लगतें हैं | जो राजनेता अपने साथ आए वह सही, सच्चा और जो विरुद्ध जाए वह गलत यह एक राजनीतिक तत्त्व बन गया है | इसतत्त्व से शायद किसी की निष्ठा ढलने का प्रश्न नहीं | खैर, राजनेताओं के लिए तो जीत के समीकरण की ही प्राथमिकता होती है | उनसे शिकायत भी नहीं, क्योंकी विशेष अपेक्षा भी नहीं |

मैं तो व्यथित हूँ राजनेताओं के अंध अनुयायीओंसे और अंध प्रशंसकोंसे | आम लोगों की निष्ठा की भी सच्चाई हमें चुनाव के समय समझ में आती है | अपने प्रिय नेता के साथ साथ यह अंधे प्रशंसक भी विभिन्न मुखवटों में नजर आतें हैं | कल तक जिन नेताओं का अभद्र भाषा में अपमान होता था, उन्हीकी प्रशंसा होने लगती है, अगर वह इनके प्रिय नेता का समर्थन करें तो | और जो साथ न आए, उसके सारे अपराध अचानक सामने आतें हैं या लाएं  जातें हैं | अंधी प्रशंसा करते करते तो यह लोग यह भी भूल जातें हैं, की बड़े से बड़ा नेता भी मनुष्य ही है...अगर अपने नेता का कोई निर्णय गलत हो, या परिपूर्ण नहीं हो – तो उससे नेता छोटा नहीं हो जाता | हर बात की प्रशंसा करनासे अगर किसी को हानी होती है, तो उस नेता को जिनकी अंध प्रशंसक प्रशंसा करतें हैं | अपने प्रिय पक्ष या नेता को राष्ट्रसे तो बड़ा नहीं मानना चाहिए |
यह अंधी प्रशंसा चाहे मुर्खता के कारण हो या स्वार्थ के कारण – राष्ट्रनिष्ठा तो कमजोर ही है |
जैसे नेता रंग बदले, अनुयायी भी नया मुखवटा धारण करके बोलने लगतें हैं |
किसी व्यक्तिविशेष, नेताविशेष या पक्षविशेष के लिए यह नहीं लिखा है...
पर आप ही बताइए ....

क्या इन मुखवटों की दुनिया में सत्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति कहीं बेजानसी नहीं हो गइ है?  

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