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03 अप्रैल 2014

मुखवटों की दुनिया

आज का काव्य आज की राजनीती और चुनावी गर्मी में बदलते रंग और मुखवटों के ऊपर हैं|

मुखवटों की दुनियामें खड़ी अजनबीसी
अकेली हूँ आज मैं, बन गई बेजानसी