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27 जनवरी 2013

सफल कर्मरहस्य

नमस्ते बंधुओं और भगिनियों| बहुत दिनों से कुछ हिंदी काव्य लिखा नहीं। आप सबका बहुत स्मरण होता था, कुछ न कुछ लिखने का मन करता था पर लिख नहीं पाते थे। आज बहुत दिनों बाद चैतन्यपूजा में हिन्दी की सेवा तथा काव्यसाधना हो रही है और मन अतिशय प्रसन्न है।


आजका काव्य इतने दिनों में जब हम यहाँ नहीं लिख रहे थे, क्या कार्यकलाप किये और उनसे क्या ज्ञान प्राप्त हुआ इस बारे में अभिव्यक्ति है। वैसे तो अपने जीवनअनुभव से जो सिखतें हैं वही अभिव्यक्त होता है, परन्तु ईश्वर की कृपा से वह सबके जीवन में प्रेरणा का प्रकाश बने ऐसाही काव्य होता है। मुझे पूर्ण विश्वास है, आज की  काव्यसाधना  से भी आपको सफल कर्म करने का रहस्य मिलेगा और जीवन प्रसन्नता से प्रकाशित होगा।

चले काव्यनगरी में .......


कुछ लिखना है हमें बहुत दिनों से
पर ना जाने शब्द कहाँ रूठें हैं
कुछ बाते करनी है हमें बहुत दिनों से
पर ना जाने कहाँ आवाज दब सी गयी है

जीवन का स्वर कुछ टूटा टूटा सा लगता है
पता नहीं क्यों अपना कोई बिछड़ा सा लगता है
रात का घना अँधेरा और सुबह की सुनहरी धूप
देखतें रहतें हैं नि:शब्द आजकल जीवन के बदलते रूप

चिंताओं ने घेरा था, कभी डगमगाया था आत्मविश्वास
उलझ गए थे कर्म - चिंता में ,
 भूल गए थे काव्यमय श्वास - प्रश्वास
शब्द फिर थम से गए थे,
अविश्रांत मन से चुप से हो गए थे

आज बहुत दिनों बाद कुछ आराम मिला
मनको चिंतासे विश्राम मिला
मन के भूलभुलैया से दूर
एकाग्र कर्म का अनुभव मिला

चिंतारहित कर्म प्रसन्नता से
यशमय होता है निर्भयता से
चिंतामय कर्म कुछ दूर यश से रखता है
शांति मन की छीन कर
जीवन के हर क्षण में अपूर्णता लाता है


यही है सफल कर्म - रहस्य
जीवन के हर क्षण में एकाग्र शांतिसे, कर्तव्यबोधसे
फलेच्छारहित अनासक्त कर्म
अनासक्ति यशापयश से, अनासक्ति भय, चिंता और हर व्यथा से
भगवद्गीता का सन्देश यह है
सफलता का कर्म रहस्य यह है

आज के तनावपूर्ण जीवन में शांतिमय सफलता का रहस्य 



मन के चंचल स्वभाव के कारण मन में हजारो विकल्प - व्यर्थ चिंताएं उठती रहती है, चिंता को सत्य मान कर कर्म अधिकाधिक परिपूर्ण हो इसलिए सदैव तत्पर रहना यह आवश्यक है, परन्तु चिंताको सत्य मान कर चिंतित होना अर्थात चिंता में आसक्त होना, यह कार्य की एकाग्रता को भंग करता है, इससे सफलता अधूरी रह सकती है। चिंता को बल मिलने से, पहले जो व्यर्थ विचार के रूप में जन्मी थी, धीरे धीरे सशक्त होते हुए, संकल्प में परिणत हो सकती है, जो संकल्प प्राय: नकारात्मक होतें हैं।

चिंता, भय, और व्यथा से अनासक्ती प्रयत्नपूर्वक संभव नहीं हैं। क्योंकी मनसे जितना लड़ें उतना ही वह सशक्त होके त्रस्त करता है, ऐसी स्थिति में, महायोग का पूर्वाभ्यास सहज अनासक्ती लाता है। कुछ देर आँखे बंद करके  शांत बैठ जाए, अपने श्वाशोछ्वास को निश्चिन्त मन से देखतें रहें, श्वास अन्दर जाता है, बाहर आता है...बस..सारे विकल्प, सारे तनाव, सारी उलझने प्राण में विलीन हो जाती है, क्योकी  जब हम श्वाशोछ्वास देखतें हैं, तो प्राण की ही पूजा करतें हैं, चैतन्य की पूजा करतें हैं। आज के तनाव पूर्ण जीवन में हमें कम से कम समय में अधिक से अधिक कार्य करना हो तो वह चिंतारहित अनासक्त कर्म करने से सहज संभव है।

आगे क्या होगा, मुझे सफलता मिलेगी या असफलता या चिंता और सफलता मिली तो क्या होगा, असफलता मिली तो क्या होगा ऐसा भय भी सताने लगता है, यह एकाग्रता से विचलित करता है।

 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन  "


भगवान् श्रीकृष्ण के इस वचन का अर्थ ही सफल कर्म रहस्य है।

श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म्रहस्य सन्देश अंगरेजी में नारायणकृपा पे : Inspiration from Bhagwadgeeta

चैतन्यपूजा में इससे पूर्व प्रकाशित श्रीमद्भागवद्गीता का सन्देश : उठा वह गांडीव  
  

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