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23 जनवरी 2012

श्रीरामनाम

श्रीरामनाम ही सार है, श्रीरामनाम ही जीवन सर्वस्व है




राम’ स्मरना है, ‘राम’ भजना है
‘राम’ गाना है, ‘राम’ ध्याना है
राम राम करते करते जीवन
यह बिताना है
राम राम हर श्वास मेरा
रामको ही जीवन बनाना है
असंभव है था यह स्वप्न में भी
‘रामकृपा’ से बना यह जीवन अभी
कल्पना में भी जो था असंभव
जीवन का आज वास्तव संभव
‘राम’ नाम बना है जीवन सरिता
‘रामप्रेम’ प्रवाह हर क्षण
विश्व में बहे यह प्रेमसरिता
शाश्वत प्रेम यह बढे हर पल
अविचल, निश्चल, फिर भी प्रवाही प्रति पल
मीठी मीठी सुगंध हलकी
कली – कुसुम की बहती बहती
ऐसा ही है राम नाम
प्रेम की पवन प्रेम की सुगंध
आसमा में बहती बहती
मुस्कुराहट भोले शैशव की
राम नाम की मिठास ऐसी
जीवन संघर्ष रण की धधगती आग में
शीतल अमृत का सागर बनती
श्रीराम नाम की मिठास ऐसी
कल्पनाओं उड़ान अनंत
तृष्णाओं की लहरे अनंत
इनमे भी है एक शांति का महासागर
राम नाम है जिसका स्वरुप अनाहत
मन में उठते संकल्प अनंत
विकल्पों का भ्रमजाल अनंत
भय भ्रम चंचलता
मन की तरंगे हैं अनंत
श्वास श्वास में है राम नाम
सबमें  सबमें  सबसे परे
केवल केवल राम नाम



14 जनवरी 2012

प्रेम ही प्रेम - 'कृष्ण और मोहिनी'


आपको स्मरण होगा, प्यार ही प्यार वो और मै”...वो? वो है कृष्ण! अंग्रेजी में लिखे भाव 'लव फोरेवर कृष्णा एंड मोहिनी – Love Forever Krishna and Mohinee यही भाव हिंदी में! कितनी भी भाषाओ में लिखे यह प्रेमकहानी कभी पूरी नहीं होनेवाली!

आज मेरा जन्मदिवस है, तिथि के अनुसार और इस वर्ष के कैलेंडर के अनुसार भी तिथि के अनुसार जन्मदिन हम पारंपरिक पद्धति से मनाते हैं पूजा और प्रार्थना भी होती है आज प्रात: यही सोच रही थी, की स्मरण हुआ मेरी पूजा तो यहाँ होती है, चैतन्यपूजा – आत्मपूजा – कृष्णपूजा!

बस् कुछ नहीं करना अब, यह प्रेम के पुष्प मेरे कृष्ण को भेंट .....

जन्मदिवस पर लंबी आयु के लिए प्रार्थना की जाती है, पर आज का जन्मदिवस ऐसा विशिष्ट है....अब तो मैं कालातीत हो गयीकृष्ण का प्यार मुझे मिल गया ...मैं सारे बंधनों से छूट गयी अब मुझे जीवन और मृत्यु कहाँ अब मुझे संसार का भय कहाँ चराचर जगत तो कृष्ण ने बनाया संसार है

बस् कितनी आनंदित हूँ, नहीं बता सकती...

कितना विशिष्ट अपने आपको महसूस कर रही हूँ नहीं बता सकती... 

07 जनवरी 2012

योगाग्नि

प्राणसाधना :

आज  का काव्य महायोग को समर्पित है इस अध्यात्म और योग पथ ने मेरा जीवन धन्य कर दिया है इससे बडा और आसान कोई अध्यात्म पथ नही हो सकता यह योगाग्नि, वह अग्नि नहीं जो हम देखतें हैं, यह वह अग्नि नहीं जो शरीर को भस्म करें यह साधना की अग्नि है योगसाधना - महायोगसाधना - प्राणयोग साधना की अग्नि है यह अंतरसे वासना मिटाए सारे कर्म, विकार जल जाते है कर्म और विकार इनका स्वरुप मन है और साधना से मन - प्राण में विलीन हो जाता है अपने ही श्वास उच्छ्वास को आते जाते देखना यह है प्राण की उपासना - यह है महायोग की साधना। मन को अपने श्वासों पे छोड़ देना ही है यह साधना। दीक्षा और कुण्डलिनी जाग्रति परम पूजनीय सदगुरुदेव की सिद्ध संकल्पशक्ति से होती है। और फिर साधना का आरम्भ होता है। सारे कर्म जलने के बाद अर्थात मन प्राण में विलीन होने के बाद जीवन समाप्त नहीं होता, परन्तु एक नया जीवन शुरू होता है अत्यंत कठिन लगनेवाला यह सारा ज्ञान और यह साधना - साधना की पूर्ति समाधी और समाधी के बाद भी एक भक्ति - मुक्त की साधना, एक भक्त की साधना यह सब गुरुकृपा से ही संभव है जो ज्ञान बड़ी बड़ी पुस्तकों में पढ़ा था, वह तो परोक्ष ज्ञान था, सच्चा