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07 नवंबर 2011

गौहत्या - मानवता पे कलंक

आज का विषय गौहत्या है| मुझे बचपनसेही गोहत्या के विषय में बहुत पीड़ा रही है| परन्तु बड़े होने पे पता चला की यह हिंदुत्व का विषय माना जाता है| अर्थात इसके बारेमें कुछ भी बोलना अपराध समझा जायेगा| मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा की फिर मै अपनी पीड़ा कैसे अभिव्यक्त करूँ| यह हमारेही संकुचित विचार है, जो हर सामाजिक, राष्ट्रीय या सांस्कृतिक समस्या को हिंदुत्व, साम्प्रदायीकता ऐसे तरह तरह के नाम देते हैं| यह समस्या से भागने का एक द्वार भी है|

फिर भी आज मुझे लगा की मैं अपनी वेदना आपके साथ बाटूं| कृपया इसे किसी पूर्वग्रह के बिना केवल एक आम भारतीय की व्यथा की दृष्टि से देखिएगा|

अब कुछ लोगों का मानना यह है की गौ को माता मानने की क्या आवश्यकता है? गौ को भगवान क्यों माना जाये? इसपे मेरा विचार यह है, की यह हमारी संस्कृति है| मेरे विचार ऐसे नहीं की हमारी संस्कृति या पंथ के नाम पे मै अड जाऊँ| परन्तु फिर भी मेरा यह कहना है की यह हमारी संस्कृति है| इसलिए हमें गौमाता की पूजा करनी चाहिए| इसका कारण यह है, जो परम्पराएँ हमारा मानव जीवन उन्नत करती हैं, जो हमें मानवता से ईश्वर की ओर ले जाती है, उनमें कुतर्क करके शंका उपस्थित करना और आधुनिकता के नाम पे, या पंथनिरपेक्षता के नाम पे उन सनातन परम्पराओं का विरोध करना एक तरह की मूर्खता है|

गौमाता के दूध ने ही हमें यह सुन्दर जीवन और तर्क करने की शक्ति भी दी है, बुद्धि दी है| क्या गौमाता के प्रति कृतज्ञता हमारा कर्त्तव्य नहीं है? क्या वह हमारी माता नहीं है? आपने कभी गौमाता की आँखे देखि होगी, उनमें एक माँ का वात्सल्य होता है| वात्सल्य गौमाता से प्रेम करनेवाले के लिए, गौमाता का द्वेष करने के लिए, गौमाता को बेचनेवाले के लिए और गौमाता की हत्या करनेवाले के लिए भी एक जैसा ही होता है? क्या गौमाता के मनमें मत, पंथ का भेदभाव होता है? सच्ची पंथनिरपेक्ष तो गौमाता होती है| और किसी भी पशु की आँखों में वह क्रूरता नहीं होती, जो एक क्रूर मनुष्य के ह्रदय में होती हैं|


पश्चिमी शिक्षा से प्रेरित होके हममेसे बहुतसे लोग अपने आपको पूर्ण और ज्ञानी मानतें हैं| पर क्या हमारा जीवन इतना आदर्श हो सकता है की सबके लिए प्रेम हो? बोलना आसान है, पर हम भी जानते हैं की वास्तव में यह कितना कठिन हैं| पर जिस पशु की आँखे ही सबके लिए माँ के प्रेम की वर्षा करती हो, वह क्या सामान्य पशु हो सकता है? अगर उसमें, हमें भगवान नहीं दिखता (भगवान नहीं भी दिखे ) पर साम्प्रदायीकता दिखती हो, तो हमारा मनुष्यत्व से पतन हो चूका है| और हम अगर गौमाता की पूजा करें तो इसमें किसीको क्या आपत्ति हो सकती है? हमारी सनातन भारतीय संस्कृति किसी भी विचार को, परंपरा को स्वीकार करने के लिए किसी को विवश नहीं करती| पर हम एक मनुष्य है, इसलिए हमारा इतना तो विकास होना चाहिए की, गौमाता की हत्या का विरोध करें|

इसी विषय से जुड़ा पहलु यह है की हमारी संस्कृति की रक्षा क्यों करनी चाहिए? किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व उसकी संस्कृति, परम्पराएँ और गौरवशाली इतिहास से होता है| केवल भौतिक सीमाएँ ही राष्ट्र का निर्धारण नहीं करती| इसलिए हमारा अस्तित्व एक भारतीय – एक हिंदू हमारी संस्कृति से ही है| जिस दिन संस्कृति छोड दी, हमने आत्महत्या कर ली| राष्ट्र का अस्तित्व समाप्त हो गया| भारत के अलावा और कुछ राष्ट्रों में अधिक संतति को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, संस्कृति की रक्षा हेतु! केवल हम ही अपनी संस्कृति को हीन भाव से क्यों देखतें हैं? हमारी संस्कृति से प्रेम करने से क्यों भयभीत होतें हैं?

किसी ने कहा की लोग गौमाता को बचतें क्यों है? यह मुद्दा भी बहुत पीड़ादायक है| पैसे के लिए? भौतिकतावाद ने हमें मनुष्य से राक्षस बना दिया है|

एक ओर सनातन भारतीय संस्कृति है, जो हर मनुष्य को तुम ईश्वर हो ऐसा बोध देती है, (तत्त्वमसि) और एक ओर आजके संस्कृतिहीन कुविचार हैं, जो हमें एक आदर्श मनुष्य भी नहीं रहने देते! छद्म-पंथनिरपेक्षता, नास्तिकता, भौतिकता जैसे नामों पे राष्ट्र का विनाश हो रहा है| सीमाओं का आकुंचन हो रहा है| आजकी मेरी पीड़ा किसी मत, पंथ, सम्प्रदाय से नहीं है, परन्तु हर मानव से है, जिसने मानवता को खो दिया है| जिसको गौहत्या उचित लगती है, हर उस व्यक्ति से है|

और एक प्रश्न संविधान की दृष्टिसे: क्या बहुसंख्य समाज की भावनाओं को, श्रद्धा को, श्रद्धास्थानों को आहत करना, पंथनिरपेक्षता (Secularism) है?

क्या  आपको यह पीड़ा नहीं है?

कलंकित है वह मानव
जिसने बेचीं है गौमाता
जिसने बेचीं है गौमाता
उसने बेची है अपनी आत्मा
जीवित मृत है वह
मानव नहीं है राक्षस वह
लोभी मन तू क्या क्या करवाये
निष्ठां राष्ट्र पे, स्वधर्म पे
पैसे के लिए बेच खाए
शत्रु तो है सजग
मिटने तेरी संस्कृति
तू भी अब समर्पित हो गया
मिटाने तेरीही संस्कृति
जिस माताने त्याग किया
अपना सबकुछ तुझे दिया
अपने पुत्र का हक भी
तुझे ही दे दिया
उसेही तू बेचेगा?
लानत है तुझपर
किसलिए तू अब जीवन ढोएगा!
हे लोभी मन, तू मर जाता
तो ही अच्छा था  
मानवता पर कलंक बन
राष्ट्र मिटाने क्यों जिया?
मानवता पर कलंक मत बन,
अपना कर्त्तव्य निभाने उठ
अपनी संस्कृति के लिए
अब जीवन तू अर्पित कर
अब भी धो सकता है
अपने पाप, अपना कलंक
हे मन! अब विचार मत कर
संस्कृति की रक्षा कर
राष्ट्र की रक्षा कर
गौमाता की रक्षा कर!

इस विषय का एक कलंकित इतिहास मुझे यहाँ प्राप्त हुआ - History of Cow Slaughter In India. 
इस विवेचन के लेखक Lndasa जी का शत शत आभार. 

कुछ भ्रमित बन्धुंओं का कहना होता है और ऐसा प्रचार भी हो रहा है, की वेदों में गोमांस लिखा है, इसका पूर्ण विश्लेषण भारतीय संस्कृति को समर्पित Agniveer.com per यहाँ देखिएगा - वेदों में गोमांस?


4 टिप्‍पणियां:

  1. namaste mohiniji,
    Indeed great article.
    i think we shld spread awareness among common ppl extensively..
    its really painful...& cow slaughtering shld be ban completely

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  2. आपकी बातों से सहमत हूँ। आखिर आधुनिकता कि अंधी दौड़ में कहाँ जा रहे हम गौ माता पर मैंने भी एक आलेख लिखा था कभी और ऐसे कई विषयों पर भी जिनमें मानवके द्वारा इन मासूम और बेज़ुबान जानवरों को दर्द और पीड़ा से गुजरने के लिएप्रताड़ित किया जाता है। मेरे उस पोस्ट का नाम भी यही था "कहाँ जा रहे हैं हम"
    कभी समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर हो सकता है आपके और मेरे विचार मिल जाएँ
    http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  3. सोनालीजी नमस्ते| आपको बहुत बहुत साधुवाद| इस आलेख को बनाने के लिए और अधिक से अधिक निष्पक्ष जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास था| आपके विचारोंसे लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहन मिलता है|

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  4. पल्लवी जी! आपका चैतन्यपूजा में स्वागत| और आपकी सहमती के लिए भी साधुवाद| आपका ब्लॉग गहरे विचारों से पूर्ण लगता है| वह पोस्ट तो जरा जल्दी में मिली नहीं| पर अवश्य गौहत्या और पशुहत्या के विरोध के लिए मै आपके साथ हूँ|

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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!