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05 अक्तूबर 2011

विजयादशमी पर्व

कल विजयादशमी है | इस पर्व पर हम रावण का पुतला जला के धर्म की अधर्म पर विजय मनातें हैं| पर आज क्या हम धर्म और अधर्म का भेद समझ पातें हैं? क्या केवल रावण का पुतला जलाके ही हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जायेगा? 

कुछ  विचार कुछ प्रश्न मन को अस्वस्थ कर रहें हैं|

धर्म का रहस्य ज्ञात न होनेसे, धर्म का रहस्य पाने की शिक्षा के अभाव से और पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से आजकल हम अधर्म को ही धर्म मान बैठें हैं| हममें यह बुद्धिभेद दृढ़ करना और हमारी सनातन संस्कृति से हमें दूर ले जाना ही इस पाश्चात्य शिक्षा का मेकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य है| इसलिए यह अधर्म प्रेम हमारे ह्रदय में दिन दिन अधिकधिक दृढ़ हो रहा है|

मै पाश्चात्य शिक्षा की विरोधी नहीं हूँ परन्तु हम अपने आप को सुशिक्षित तभी कह सकतें हैं , जब हमारी बुद्धि और विचार तर्कशुद्ध, न्यायसंगत हो|

इसलिए आतातियों को मारने की अपेक्षा वह सरकारी संरक्षण में रहतें हैं| उनके संरक्षण में आज मानवता मानी जाती है| जो मानवता पे कलंक है, उनके मानवाधिकारों की चिंता की जाती है|

क्या आज हमें बड़ी से बड़ी पाश्चात्य शिक्षा से इतनीसी बात का भी ज्ञान नहीं होता की राष्ट्र की सीमाओं संरक्षण प्रधानमंत्री का प्रधान कर्त्तव्य है? सीमाओं में विवाद होना ही नहीं चाहिए| किसी भी राष्ट्र की जनता यह बात सह नहीं सकती की अपने राष्ट्र के किसी राज्य पर शत्रुराष्ट्र दृष्टि रखें| और अपने ही राष्ट्र के लोग जब ऐसी बातें करने लगतें हैं, तब वह राष्ट्रद्रोही होतें हैं| ऐसे राष्ट्रद्रोहियों को जनता का प्रेम मिलना तो असंभव परन्तु जनता के रोष का सामना करना पड़ता है| परन्तु भारत में दृश्य इसके विपरीत क्यों होता है?

राष्ट्र की एकता और अखंडता, राष्ट्र के सीमाओं की और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता होनी चाहिए| भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे बादमें| राष्ट्र में फ़ैल रहे जिहादी आतंकवाद और लव जिहाद से सारी जनता चिंतीत होनी चाहिए| परन्तु जनता को भ्रमित किया जाता है की भ्रष्टाचार के अलावा इस राष्ट्र में कोई समस्या अब है ही नहीं| प्रत्येक नागरिक में शौर्य होना चाहिए| परन्तु हम बचपनसे अहिंसा का पाठ पढते ही पलते बढतें हैं| एक कमजोर – असहाय लाचार जीवन हम पे अहिंसा के, धर्म के नाम पे थोपा जाता है| एक ऐसा जीवन जो किसी दंगे में, बमविस्फोट में या किसी कायर आतंकवादी की गोलिसे मरने के लिए लाचार हो| अगर अहिंसा से ही ह्रदय परिवर्तन होते, अनशन से ही क्रांतिया होती तो हिंदुओं का महाभयंकर संहार माताओं – बहनों पे अत्याचार और राष्ट्र के टुकड़े नहीं होते| पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर में यह अत्याचार अब भी जारी नहीं होते|

सत्य को हम छुपा सकतें हैं, परन्तु झुटला नहीं सकते|

धर्म और अधर्म का भेद ज्ञात न होनेसे हम कुतर्क को ही बुद्धिमानी मानतें हैं| और आत्मनाश और राष्ट्रनाश में गौरव का अनुभव करतें हैं|

मेरे विचार से इतिहास के तथ्य, वर्त्तमान का वास्तव और धर्म के शाश्वत तत्व जो व्यक्तिगत, सामाजिक जीवन को सुरक्षित और न्यायोचित पद्धतिसे संपन्न बनाएँ इन सबको जोड़कर आगे क्या हो सकता है, इसका विचार करना और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना यह तर्क है|

कुतर्क वह है, जो मनसे कल्पित होता है| वास्तव और जीवन जीनेके शाश्वत सिद्धान्तोसे परे होता है| उसमे परिणामों की चिंता नहीं होती| कुतर्क केवल मनको आनंद देता है और अपने आप के बुद्धिमान होने का भ्रम उत्पन्न करता है| 

आइये! इस विजयादशमी को रावण का केवल पुतला जलाने की अपेक्षा अपने मन से छद्म धर्मनिरपेक्षता और आत्मघातकी अहिंसा जो राष्ट्रीय सुरक्षा को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है उन्हें भी जला दे| राष्ट्रद्रोहियों के विरुद्ध उठें जाग्रत हो| 


हमारे विचार और कार्य राष्ट्रहित में हो| हमारी सनातन भारतीय संस्कृति का संरक्षण ही वास्तव में मानवता के लिए कार्य है|


भगवान श्रीराम साम्प्रदायीकता के नहीं अपितु विकास, मानवता, धर्म, प्रेम, राष्ट्रभक्ति इनके सर्वोच्च आदर्श हैं|


हम हमारी बुद्धि और समय का सदुपयोग करें और राष्ट्रविघातक शक्तियों का बहिष्कार करें - पूर्ण विरोध करें|


राष्ट्रशत्रु चाहे राष्ट्र के अंदर हो या बुद्धिजीवी वर्ग जो बुद्धिभेद करतें हैं वह हो, प्रसारमाध्यम हो या तथाकथित कला (चलचित्र) के लोग हो| उन्हें पहचानें और उन्हें बहिष्कृत करें|

सही अर्थ में धर्म की अधर्म पर - सत्य की असत्य पर विजय मनातें हैं| 

भगवान  श्रीरामचंद्र जी की जय| 


आप सबको विजयादशमी पर्व की हार्दीक हार्दीक शुभकामनाएँ|



4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद सिमरन| देरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|

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  2. धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है । धर्म के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है ।
    धर्म पालन में धैर्य, विवेक, क्षमा जैसे गुण आवश्यक है ।
    ईश्वर के अवतार एवं स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । लोकतंत्र में न्यायपालिका भी धर्म के लिए कर्म करती है ।
    धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस परिस्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
    अधर्म- असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म होता है । अधर्म के लिए कर्म करना, अधर्म है ।
    कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म (किसी में सत्य प्रबल एवं किसी में न्याय प्रबल) -
    राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मंत्रीधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
    जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक एवं परमात्मा शिव की इच्छा तक रहेगा ।
    धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर के किसी रूप की उपासना, दान, परोपकार, यज्ञ) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
    धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
    राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।
    by- kpopsbjri

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    1. नमस्ते महानुभाव | आपका नाम तो हमें पता नहीं, परन्तु ज्ञान का नाम कुछ भी हो, ज्ञान तो ज्ञान ही है | ज्ञान को चैतन्यपूजा में हमारे साथ बाटने के लिए, आभार तो कम ही है, परन्तु आपको हमारे शत शत प्रणाम | देरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ |

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चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!