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19 मई 2011

कविता: कदमो में है जहाँ तुम्हारे

एक अलग भाव लेकर यह कविता आयी है जीवन में कभी कभी या बहुत बार, हम आपने आप को औरों से कम , हारा हुआ मानते हैं कभी कभी किसीके अपमानित करने पर या हमें तुच्छ ठहराने पर हम अन्दर से टूट जाते हैं, जब हमें तोड़नेवाले हमारे ही स्वजन हों, तब तो उठना और लक्ष्य की ओर बढ़ना असंभव सा हो जाता है पर यह तो सब एक भ्रम है किसी भी कारण से हो पर रुकना और अपने आपको हारा हुआ मानना अपनी ही मूर्खता है अपने विस्मृत आत्मविश्वास को और आत्मस्वरूप की याद दिलानेवाली यह कविता  आपको जरूर भाएगी

03 मई 2011

एक आसूँ भोलासा

अब तक की कविताओं में बहुत ख़ुशी और प्रेम था, पता नहीं क्यों और कैसे पर ह्रदय आज रो उठा और एक आसूँ भोलासा यह काव्य बोल उठा ................


पता नहीं खुश थी या दु:खी
हस रही थी या सोच रही थी 
दुःख दर्द मिले ऐसे जीवन में 
की रोना ही भूल गयी 
हाँ, रोना भी भूल गयी 
लोग हँसना भूलते है