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20 फ़रवरी 2011

नमस्ते नमस्ते प्रभो लोकनाथ |


आज मेरे सद्गुरुदेव परम पूजनीय श्री नारायणकाका महाराज जी के सद्गुरू , मेरे परम गुरु परमहंस परिव्राजकाचार्य १००८ श्री लोकनाथ तीर्थ स्वामी महाराज, जिनको की हम सब प्रेम से स्वामी महाराज बोलते हैं , उनकी पुण्यतिथि है  सिद्धयोग ( महायोग ) की चैतन्यगंगा इन्होने हि महाराष्ट्र मे लायी जिसके कारण आज हम विश्वबन्धुता के प्रसार हेतु इस चैतन्यपुजा में जुड़े हैं

 माँ भगवती ने उनको आदेश दिया 'दक्षिण को चलो' और वे इस मराठी देश में आये मेरे गुरुदेव को जब वे अभियांत्रिकी महाविद्यालय में थे, तब स्वामी महाराज जी से दीक्षा प्राप्त हुई 

स्वामी महाराज जी का जीवन वास्तव में सन्यासी जीवन के नियमोसे परिपूर्ण था, जो की आज के समयमे दुर्लभ सा हो गया है कोई पालन करना भी चाहे तो तो भी यह असंभव सा प्रतीत होता है उनकी कठोर परन्तु उनके लिए सहज ऐसी साधना - तपस्या आज के समय में करना शायद ही संभव हो

स्वामिमहाराज जी के बारेमे तो जितना लिखा जाए कम ही है  उनकी प्रतिमा देख के मन ऐसा शांत हो गया , की कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है तपस्या से - विशुद्ध जीवन से - साधना से जो चैतन्य प्रकट होता है , उसका अनुभव सदा रहता है , यही यह प्रतिमा देखके मन में आ रहा है स्वामी महाराज हम सबके बीच ही है आप भगवान को माने या न माने , पर स्वामी महाराज जी की यह प्रतिमा देख के एक अद्भुत शांति का अनुभव आपको अवश्य होगा

इस प्रतिमा को प्रकाशित करने की अनुमति देनेके के लिए मै प.प. श्री लोकनाथ तीर्थ स्वामी महाराज महायोग ट्रस्ट (नाशिक)की मै ह्रदय से आभारी हूँ

सिद्धयोग के इस सहज तम पथ पे सद्गुरु देव की सच्ची सेवा तो साधना में नियम से बैठना और सिद्धयोग का विश्व बंधुता का सन्देश प्राणिमात्र तक पहुँचाना बस यही है 

जीवन के भयंकर संघर्षमय पथ पे भी शांत सहज जीवन की प्राप्ति सिद्धयोग से ही मुझे हुई है

मेरे सदगुरुदेव मेरी ही नहीं विश्व की भी माता है और  स्वामी महाराज जी उनकी भी माता उनके सद्गुरु ! आजे के दिन उनकी सेवा किस प्रकार हो सकती है, कुछ सोचा नहीं था, माँ भगवती की कृपा से एक संस्कृत स्तोत्र स्फुरित हुआ फिर मन में आया, यही तो सच्ची सेवा है , मेरी मातृभाषा मराठी है, और सारी भाषाओंकी माता संस्कृत है मेरी माता की भी माता आज प्रथम ही आपके समक्ष कुछ संस्कृत प्रस्तुत कर रही हूँ मैं थोड़ी सी संस्कृत सीखी हूँ , परन्तु इतनी नहीं की संस्कृत में रचना कर सकूँसद्गुरुदेव की , परम गुरुदेव की कृपा क्या होती है , इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है ! आज एक और भाषा में प्रवेश हो रहा है स्वामी महाराज जी के , सद्गुरु रूपी माँ के और सदगुरुदेव के ही अनंत रूप आप सब के चरणों में प्रार्थना है , की ऐसेही सेवा इस बालिका से होती रहे

विश्व बंधुत्व दिवस के विषय में आगे लिखती रहूंगी

काव्य अति सहज और सरल है , इसलिए इसका अनुवाद नहीं लिख रही हूँ 



प्रतिमा सौजन्य: http://mahayoga.org/


नमस्ते नमस्ते प्रभो लोकनाथ |
नमस्ते नमस्ते प्रभो विश्वनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे प्राणनाथ |
नमस्ते नमस्ते सदा एकनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे शक्तीनाथ |
नमस्ते नमस्ते हे जगन्नाथ ||

नमस्ते नमस्ते गुरो नारायण |
नमस्ते नमस्ते सदगुरो लोकनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे जगद्गुरो |
नमस्ते नमस्ते हे परम सदगुरो ||

पाहि पाहि हे प्रभो लोकनाथ |
पाहि पाहि हे विभो विश्वनाथ ||



आपको मेरे शब्द सुन्दर प्रतीत होते हैं, पर इसमें मेरा कर्तृत्व नहीं , मेरे गुरुदेवकी कृपा और उनका मेरे जीवन पे प्रभाव ही कारण है इसलिए आप प्रशंसा करते हैं तो मुझे बहुत संकोच होता है

09 फ़रवरी 2011

और भी कुछ अच्छा लगता है ............


इस काव्य का पूर्व भाव  कुछ अच्छा लगता है पहले अवश्य अनुभव करियेगा |

बहुत समय बाद  कुछ अच्छा लगता है ............फिरसे प्रस्तुत कर रही हूँ |  जो प्रस्तुत कर रहे हैं, वैसा भाव मन में न हो तो मन के भावों के विपरीत काव्य प्रस्तुत करना एक तरह की मजबूरी लगती है | हम तो यहाँ पूजा करने आते हैं | मजबूरी काहे की  ! और समय के साथ मंदिर का स्वरुप भी कुछ नया सा है | हो भी क्यों ना | हमारे मनमे सहज ही भक्तिभाव जागृत हो चराचर में व्याप्त चैतन्य के लिए . तो हर काम पूजा बन जाता है और जहाँ भी हम हो वही मंदिर बन जाता है | यह ब्लॉग तो मंदिर ही है  | यहाँ आपके भी सुन्दर सुन्दर शब्द पुष्प आ रहे है | 
तो चलिए , आज देखतें हैं की हमें और क्या क्या अच्छा लगता है | देखिये!  सदगुरुदेव की कृपा कैसी होती है | मन अपने आप 'अमन' हो जाता है ........यही तो 'सच्चा नमन' है, नमन की यह व्याख्या मेरी नहीं मेरे सदगुरुदेव परम पूजनीय नारायणकाका महाराज की है | यह नमन, ईश्वर के प्रति, सबके प्रति मेरे गुरुदेव के असंख्य रूप आप सबके प्रति  |

तुलसी का वह पौधा 
कितना अच्छा लगता है 

एक बालक भोलासा 
बहुत अच्छा लगता है 

बालक जैसा मन हमारा 
बहुत अच्छा लगता है 

एहसास यह भोलाभाला 
बहुत अच्छा अच्छा लगता है 

काव्य रोज नया नया 
अच्छा ही लगता है 

दोस्त वह पुराना 
अच्छा ही लगता है 


प्यार एक नया नया 
अच्छा ही लगता है 


जीवनसे प्यार मनसे प्यार 
प्यारसे प्यार अच्छा लगता है

दु:ख हलका कर दे 
रुदन वह अच्छा ही लगता है 


मन का बोझ मिटा दे 
दर्शन वह ईश्वर का 
अच्छा ही लगता है 


अच्छा अच्छा सब कुछ 
ईश्वर का रूप हर ओर 
सच्चा लगता है 

मीठा मीठा यह पल 
अच्छा ही लगता है 

तृष्णा से परे तृप्त जीवन 
खूब अच्छा लगता है 

निराशा का एक बादल 
वह भी अच्छा लगता है 

आशा यश प्रेम की वर्षा 
सब कुछ अच्छा लगता है 

चंद्र तारे निशा अन्धीयारी 
सब कुछ अच्छा लगता है 

अमावास की रात काली 
काली मा का यह स्वरूप 
अच्छा लगता है 

भीषण अंध:कार भी 
नयासा लगता है 
अंधकार भी देता है 
शक्ती प्रकाश ढुन्ढनेकी 
इसलिये प्रकाश के साथ 
तिमिर भी अच्छा लगता है 

बस बस क्या कहू 
सबसे बाते करना 
अच्छा ही लगता है 

प्रेमकी सौरभ हर दिशामे 
फैले, एक काम यह 
अच्छा लगता है 

संदेश विश्वबंधुता का 
सद्गुरुजीने जो दिया 
अब इसे फैलाना 
बस् यही
 अच्छा लगता है

स्वप्न यह आज वास्तव 
मनको बडा अच्छा लगता है 

हिंदी यह नव जींवन 
अच्छा लगता है 

दत्त का यह स्मरण 
अच्छा लगता है 

भाव हर पल नयासा 
अच्छा लगता है 

ब्लाग यह नया नया 
अच्छा लगता है 

श्रीरामसे मिलन हुआ
जीवन अब सार्थक लगता है 

क्या लगता क्या नही लगता 
मनसे परे अमन हो 
नमन यह... नमन यह.....

तालाब वह शांतसा 
मन बन गया हंस सा 

सूर्य का प्रकाश यह 
अब अच्छा लगता है 

मधुर संगीत निसर्ग का 
अच्छा लगता है 

आशा निराशा से परे 
जीवन यह 
अच्छा लगता है 

ज्ञान यह नया नया सा 
अच्छा लगता है 

कार्य पूर्ण हुआ मनका 
अच्छा लगता है 

मन भोलासा कोई 
बच्चा लगता है 

स्मरण आज दादिका 
बहुत अच्छा लगता है 

ईश्वर की देन यह प्राण मेरा 
अच्छा लगता है 

तन मन अर्पण ईश्वरको 
सपना यह सच्चा लगता है 

भक्ति का रूप यह नया
आज फिरसे अच्छा लगता है 

बिल्लिका वह बच्चा छोटासा 
बहुत प्यारा लगता है 

थंडी हवा का स्पर्श 
अच्छा लगता है 

मौसम कोई भी हो 
खुश रहना हमें 
सदा अच्छा लगता है 
सदा अच्छा लगता है........

 सब कुछ अच्छा अच्छा हि लगता है......
सदा सब कुछ अच्छा अच्छा ही लगता है 

और 

क्या यह काव्य, 
मन का यह भाव दिव्य 
आपको 
अच्छा लगता है ?

इस काव्य का एकेक भाव इतना सुन्दर है की क्या वर्णन करूँ ! कितने सुन्दर अर्थ छिपे हैं इसमें | आपको यह तो नहीं लगेगा यह मेरी आत्म प्रशंसा है, आपको तो पता है ना, यह तो भगवान का उपहार है, नहीं तो इतना सुन्दर काव्य ऐसेही कैसे लिख देती |
तुलसी का पौधा , भोलासा बालक और बालक जैसा मेरा मन ...सब एक ही इशुधा पवित्र दर्शातें है | इसका अर्थ हमारा मन पवित्र हुआ तो सब ओर हमें पवित्रता नजर आती है और मन का ही मैल विश्व में गन्दगी दिखता है | स्वामी विवेकानंद जी की दिव्य वाणी में मैंने यह बात सदैव सुनी है (देखिये! जब भी हम स्वामीजी की बातें पढतें हैं, क्या ऐसा नहीं लगता है की वो आज भी हमसे बात करतें हैं |) की आपको अब भी दुनिया में कहीं बुराई नजर आ रही है इस बात का दुःख होना चाहिए | कुछ शब्द जैसे अभी  स्मरण हो रहें हैं , कुछ गलत हो तो क्षमा करियेगा, परन्तु उनको जो कहना है वह यही है | अब मै सोचती थी, 'मुझे तो बुराई नजर आती है, पाप नजर आता है , दुनिया में | तो क्या करूँ |' सच बताऊँ, यह लिखते समय ,अभी मुझे समझ में  आ रहा है की स्वामीजी क्या कहना चाह रहें हैं |

यहाँ गांधीजी का विषय लिखके मुझे काव्य की सुन्दर दिशा और भाव दूषित नहीं करना है | परन्तु एक प्रश्न उठता है, भलेही हमारी नजर में हर ओर पवित्रता भरी हुई है, परन्तु व्यवहार की और सामाजिक जीवन की मर्यादा अध्यात्म के नाम पे छोड़ना क्या सही होगा? मेरा कहने का अर्थ है , भगवान मेरे देशबांधव में भी है और मेरे देश के शत्रु में भी है ..सत्य है ,  और इन दोंनो की पूजा भी होनी चाहिए , पर देशबांधव की पूजा बंधुत्व से और राष्ट्रद्रोही की पूजा उसको दंड देके | मुझे थोडासा ऐसा लगता है, हम अध्यात्म पूरी तरह से उलट कर के देख रहें हैं | जो गांधीजी की दृष्टि से हम देख रहे हैं | और देश के हर प्रश्न में यह उलट दृष्टि अतिशय भयानक सिद्ध हो रही है |
इस काव्य के सारे भाव विस्तृत रूपसे प्रसिद्ध करने का प्रयत्न है, आपका सहयोग और प्रेम ऐसेही मिलता रहे |