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26 जनवरी 2011

सत्ता प्रजा की है कौनसी ?

प्रजासत्ताक दिन की आप सब को  हार्दिक बधाइयाँ ! क्षमा किजीये, परंतु मुझे य नही समज मे आ रहा की मै  किस लिए यह बोल रही हूँ , बस इस दिन सब ऐसा करतें हैं इसलिए ? जो भी कारन हो, परन्तु मेरा मन आज आनंदित नहीं हैं और मनमे अनेकानेक प्रश्न उठ रहें हैं .........

स्वतंत्रता यह है कैसी 
सत्ता प्रजा की है कौनसी 
धर्मान्धतासे लड़ने की नाम पे 
धर्मनिरपेक्षताकी हिंसा यह कैसी 
रामसे द्वेष बनके शिष्य गान्धिके 
अहिंसा के आड़ में हिंसा यह कैसी 
सैन्य के  प्राण जहाँ शत्रुओंको 
दिए जाते हैं दान में 
दानवीरता यह आधुनिक 
भारतमे आज कैसी ?
जनता है खिलौना केवल 
प्रजासत्ताक यह भूमि कैसी 
आपको ही अब है खड़े होना 
आवाज बुलंद है अब करना 
हम नहीं हैं कमजोर 
हम नहीं है नपुंसक 
क्यों नहीं दिखाते 
विश्वको स्वरूप अपना 
रोका है आपको किसने 
विचारोंको आपको है बदलना 
आग है ह्रदयमें, बाजुओमे दम हैं 
हार के फिर भी बैठे आज क्यों हम हैं 
उठो मेरे वीर सपूतो 
भारत माँ पुकार रही है
उठो मेरे वीर सपूतों 
भारत माँ पुकार रही हैं .........

बस इसके आगे कुछ नहीं लिखा जा रहा, हम देश की लिए बोल रहें हैं , हिंदुत्व के लिए नहीं, आज देशभक्ति भी अपराध हो गया हैं, मन बहुत व्यथित है | हम हमारे देश के लिए, अपना प्रेम भी अभिव्यक्त नहीं कर सकते और नाटक करतें हैं प्रजासत्ताक होने का ? ...............आज कुछ नहीं लिखा जा रहा ...........

यदि आप इन विचारोंसे सहमत हो तो कृपया इसे Indivine पे प्रोत्साहित करें और देश्भक्तिका सन्देश अपने बंधुओ तक  पहुचाये कृपया क्लिक करें यहाँ   (आपका बहुत बहुत धन्यवाद !)

10 जनवरी 2011

विरहवेदना

'कुछ अच्छा लगता है' यह अभी अधुरा है....परन्तु मन के भाव बदलते रहते है...आज का काव्य कुछ और भाव का है | सीताजी जब अशोकवनमें थी...प्रभु श्रीराम से दूर हर क्षण विरह वेदना से पीड़ित| उनके मन की अवस्था कैसी होगी| अनेको बार रामायण की कथा पढ़ी सुनी है हम सबने | पर एक एक प्रसंग पर गहराई से मनन चिंतन हो तो लगता है ....माँ सीताजी की अवस्था कैसी होगी ......राम के बिना |