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25 दिसंबर 2011

कुछ पल खुशी के

आज आपके साथ बाटनें हैं खुशी के पल! एक साल से हमारा साथ हैं, अब आपको बताएं बिना कैसे रह सकतें हैं! :) :)


जीवन की भाग-दौड में कभी कभी मिलतें हैं ऐसे कुछ पल खुशी के 


कुछ पल खुशी के हलके से!
कुछ अहसास मीठी यादोंके
कुछ पल भोले भोले
कुछ पल प्यारे प्यारे

08 दिसंबर 2011

प्यार ही प्यार - 'वो और मैं '


मेरा अंग्रेजी काव्य लव फोरेवर मी एंड ही – Love Forever 'Me and He' अब हिंदी में, कुछ विशेष गहरे प्रेम के साथ...
जहाँ प्यार हो वहाँ हर दुःख दर्द समूल मिट जाता है,

Image: Yellow Wild Flower



खोजने न निकले हम उनको
न वो हमें खोजने चले थे
खोज तो खत्म हुई ‘प्यार’ की

24 नवंबर 2011

कविता: यश दिया है तुमने


मेरे प्यारे सम्मानित मित्रों! आप सबको नमन शतशः आज हमारी चैतन्यपूजा को एक वर्ष पूर्ण हुआ है एक वर्ष पूर्व इस पूजा की अभिव्यक्ति ब्लोगिंग जगत में आरम्भ हुई पहले तो अंग्रेजी ब्लाग गुरुकृपा आरम्भ हो चूका था, सोचा कुछ काव्य हिंदी में प्रस्तुत किये जाय हिंदी साहित्य यह मेरे जैसे अभियंता का विषय नहीं हैव्याकरण में तो कुछ ना कुछ गलती होने का भय मुझे हमेशा रहता है पाठशाला के कुछ वर्ष ही हिंदी अभ्यास हुआ था, और बाद में गीताप्रेस की पुस्तकों ने शुद्ध हिंदी का ह्रदय से परिचय करा दिया

20 नवंबर 2011

एक शब्द प्यार का

मेरे अंग्रेजी ब्लाग गुरुकृपा पे प्रकाशित 'द वर्ड ऑफ लव - The Word Of Love' काव्य अब हिंदी में 


Image: Wilde Flowers


एक शब्द प्रेमका
जीवन बदल देगा
एक शब्द आशाका
हर दुःख मिटा देगा
एकही शब्द

10 नवंबर 2011

हे गौमात:! मुझे क्षमा करना|


पिछले आलेख गौहत्या -मानवता पे कलंक में हमने गौहत्या की चर्चा की, इसी विषय को जरा और विस्तार से देखें| 

दिनांक ७ को गौमाता की सामूहिक हत्याओं की प्रतिमाएँ देखनेका पाप हो गया| एक विशाल मैदान हैं, रक्त की नदियाँ बह रही है और गौमाता की सानंद हत्या का उपक्रम निष्ठां से चल रहा है| नहीं लिखा जाता दु:ख! किसी और दृश्य में एक पर्व का हर्षोल्लास मनाने के लिए गौमाता के मस्तक काट के पंक्तिबद्ध सजाएं गएँ हैं| साथ में रक्त की नदियाँ पवित्रता (!) निर्माण करती हुई|

07 नवंबर 2011

गौहत्या - मानवता पे कलंक

आज का विषय गौहत्या है| मुझे बचपनसेही गोहत्या के विषय में बहुत पीड़ा रही है| परन्तु बड़े होने पे पता चला की यह हिंदुत्व का विषय माना जाता है| अर्थात इसके बारेमें कुछ भी बोलना अपराध समझा जायेगा| मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा की फिर मै अपनी पीड़ा कैसे अभिव्यक्त करूँ| यह हमारेही संकुचित विचार है, जो हर सामाजिक, राष्ट्रीय या सांस्कृतिक समस्या को हिंदुत्व, साम्प्रदायीकता ऐसे तरह तरह के नाम देते हैं| यह समस्या से भागने का एक द्वार भी है|

फिर भी आज मुझे लगा की मैं अपनी वेदना आपके साथ बाटूं| कृपया इसे किसी पूर्वग्रह के बिना केवल एक आम भारतीय की व्यथा की दृष्टि से देखिएगा|

26 अक्तूबर 2011

दिपावली का दिव्य प्रकाश

यह दीपावली और नववर्ष आप सबको और आपके परिवार और मित्रजनोंको  चैतन्यमय, आनंदमय और सम्पन्नता से परिपूर्ण रहें ऐसी हार्दिक शुभकामनाएँ| आईये ज्ञान के दीप लगाएँ और सनातन संस्कृति का प्रकाश अखिल ब्रह्माण्ड में फैलाएँ|


जन जन में फैले ज्ञान का प्रकाश 
मिटे अज्ञान तिमिर हो मोहनाश
संपत्ति शुभलक्ष्मी हो अचल स्थिर 
शुभ गुणों से हो जनमन सुस्थिर 
राष्ट्र में हो एकता अखंडता 
राष्ट्रशत्रुओं का हो पूर्ण विनाश
दीपावली दे हमें पूर्ण प्रकाश
प्रेम,उत्कर्ष और सांस्कृतिक अभिमान 
विश्व में फैले शांति का प्रकाश

दीपावली  विशेष  मेरे मराठी ब्लॉग विचारयज्ञ पे ब्लॉग की प्रथम वर्षगाठ पे और इंग्रजी ब्लॉग गुरुकृपा पे .... 

21 अक्तूबर 2011

राष्ट्रधर्म है बढ़ाना

हमें बरसों से अहिंसा का पाठ पढाया जा रहा है| शौर्य की निंदा हमारे मन - मस्तिष्क में बिठाई गयी है| हमें हमारे गौरवशाली इतिहास से अनभिज्ञ रखा गया है| हमारे वीरों ने अतुलनीय शौर्य से सदैव इस राष्ट्र की रक्षा की है| भारतीयों के शौर्य की कहीं तुलना नहीं| परन्तु हमें स्वाभिमान हीन बनने के लिए, मनसे सदैव गुलाम रखने के लिए मेकाले ने एक षड़यंत्र रचा| हमारी शिक्षाव्यवस्था ऐसी बनाई की हम हमारी संस्कृति पे गौरव करने के बजाय शर्म महसूस करें| अहिंसा की आड में हमें शस्त्रविहीन कर दिया गया| हमें गुलाम ही बनके जीना पड़ेगा, यही सिखाया गया| इसीका परिणाम है, की आज संदीप पाण्डेय और मेधा पाटकर हमारे ही राष्ट्र के सैन्य विरुद्ध यात्रा कर रहें हैं और हमें इस बात से जरा भी गुस्सा नहीं आ रहा| इस विषय की विस्तृत चर्चा इस आलेख में कृपया अवश्य पढ़ें राष्ट्रभक्ति  |

संविधान का उल्लंघन करने वाली हिंसा का मै समर्थन नहीं करती, परन्तु गुलाम बनानेवाली इस अहिंसा की मानसिकता का विरोध कर रही हूँ|

आज  की रचना इसी विषय पर,

13 अक्तूबर 2011

खामोश पल


अध्यात्म  जानना और जीवन में सहजता से आना इसमें बहुत अंतर है| जानना पहली स्थिति है| पर सच्चा आनंद तो अध्यात्म जीवन में सहजता से आने में ही है | मै बचपन यह बातें पढ़ती आ रही हूँ की संसार में रहकर भी अध्यात्म ज्ञान मिल सकता है | पर मुझे यह संभव नहीं लगता, कुछ एकांत, सम्पूर्ण एकांत जीवन बदल सकता है| संसार से भागना संभव नहीं | पर कुछ एकांत अवश्य संभव है| इस एकांत से अध्यात्म जीवन में उतरता है| जो ज्ञान पुस्तकों से नहीं मिल सकता है, वह ईश्वर के साथ बिताएं कुछ शांत पलों से मिल सकता है|

आज ऐसेही कुछ एकांत और एक शांत पलों की बातें,

05 अक्तूबर 2011

विजयादशमी पर्व

कल विजयादशमी है | इस पर्व पर हम रावण का पुतला जला के धर्म की अधर्म पर विजय मनातें हैं| पर आज क्या हम धर्म और अधर्म का भेद समझ पातें हैं? क्या केवल रावण का पुतला जलाके ही हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जायेगा? 

कुछ  विचार कुछ प्रश्न मन को अस्वस्थ कर रहें हैं|

धर्म का रहस्य ज्ञात न होनेसे, धर्म का रहस्य पाने की शिक्षा के अभाव से और पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से आजकल हम अधर्म को ही धर्म मान बैठें हैं| हममें यह बुद्धिभेद दृढ़ करना और हमारी सनातन संस्कृति से हमें दूर ले जाना ही इस पाश्चात्य शिक्षा का मेकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य है| इसलिए यह अधर्म प्रेम हमारे ह्रदय में दिन दिन अधिकधिक दृढ़ हो रहा है|

22 सितंबर 2011

हँसता हुआ चंदा

पूनम के चन्द्रमा का सौंदर्य ऐसा होता है की कोई भी कवी बन जाएँ चन्द्रमा के सौंदर्य पर आज तक कितनेही महान कवियों ने अनुपम रचनाये की है 

एक दिन ऐसेही चन्द्रमा के सौंदर्य ने मुझे भी मोह लिया और एक नयाही भाव ह्रदय से प्रस्फुटित हुआ, यह भाव अंग्रेजी में मेरे The Smiling Moon स काव्य में अभिव्यक्त हुआ है, इसी भाव की यह हिंदी अभिव्यक्ति, माँ शारदे की कृपासे एक ही काव्य विभिन्न भाषाओं में प्रस्तुत हो रहा है 
आपने अंग्रेजी काव्य को बहुत सराहा है, आपको हिंदी भाव भी अवश्य अच्छा लगेगा

14 सितंबर 2011

नमन हे हिंदी भाषा

आज १४ सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जा रहा है| आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ| हम सब यहाँ हिंदी की पूजा में जुड़ें हैं, आज माँ शारदा का रूप हिंदी भाषा को नमन| 

हिंदी में उर्दू का मिश्रण उचित नहीं| आज कल यह असंभव सा प्रतीत होता है, उर्दू बिना हिंदी| परन्तु हम प्रयत्न कर सकतें हैं| 

हर भाषा की अपनी गरिमा होती है| केवल उर्दू हो तो उसकी अपनी खूबसुरती  है|

हिंदी तो संस्कृत से निर्मित दैवी वाणी है|  

आप एक वाक्य उर्दू मिश्रण से, या अंग्रेजी मिश्रण से और वही वाक्य संपूर्ण हिंदी में उच्चारण करके देखिये| एक विनम्रता और शालीनता का अनुभव होता है, सम्पूर्ण हिंदी से| 

30 अगस्त 2011

आज मैंने ईश्वर देखा

आज की प्रस्तुति मन के खिलते उमलते दिव्य भाव हैं, जो सत्य सनातन ग्रंथोंमें वर्णित है की ईश्वर सर्वव्यापी है उसीकी एक सुन्दर अभिव्यक्ति....

आज खिलता हुआ मन, मनसे परे ईश्वर में मिला गया और बस इन दिव्य भावों को बोल उठा.......

एक दिव्य आनंद सब ओर छा गया .....

आज मैंने ईश्वर देखा 
खिलती कलिमे मेरा 
ईश्वर देखा

21 अगस्त 2011

प्रार्थना: हे राधेकृष्णा

जन्माष्टमी की आप सबको बहुत बहुत बधाई बहुत आनंद का उत्सव है, आज यशोदा के घर साक्षात् भगवान् आये हैं


यह मनमोहक छवी धुले - महाराष्ट्र के महानुभाव श्रीकृष्ण मंदिर की है बस पहली बार इन्हें देखा और ह्रदय बोल उठा..........

12 अगस्त 2011

रक्षा का प्यार भरा बंधन

कल रक्षाबंधन का त्योहार है और मेरे प्यारे भाइयों के लिए मेरा प्यार इस काव्य में .........

रक्षा का जो वचन
दिया था तुमने
हर बुराईसे, हर दु:ख दर्द से
हर पीड़ा, हर दहशत से
यूँही निभाते रहना

06 अगस्त 2011

सुनहु गोपाल मेरे


आज की प्रस्तुति क्या है, यह मैं कैसे बताऊँ, श्री राधाजी का प्रेम और विरह कौन जान सकता है, मेरे लिए राम – कृष्ण और राधा – सीता कोई भेद नहीं है|


02 अगस्त 2011

सुन ऐ जालिम

आज की प्रस्तुति और काव्य अत्याचार करनेवालोंको एक चेतावनी है| हिन्दू धर्म में कर्मसिद्धांत प्रतिपादित किया गया है| जो आज के विज्ञान के अनुसार ही है| कर्मसिद्धांत के अनुसार हमें हमारे हर छोटे बड़े कर्म का फल कर्म के अनुरूप अवश्य मिलता है| यह निसर्ग है| जो भी कर्म हम करतें हैं वह शक्ति का ही आविष्कार है, शक्ति - उर्जा बिना हमारा जीवन - जीवन ही नहीं रहेगा |  आइन्स्टाइन के उर्जा संरक्षण के नियमानुसार शक्ति निर्माण भी नहीं की जा सकती न नष्ट की  जा सकती है | वह तो केवल एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित होती है | तो हमारे कर्म नष्ट कैसे होंगे? वह तो अच्छे या बुरे स्पंदनों के रूप में वातावरण में रहेंगे| न्यूटन  के तिसरे सिद्धांतानुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है|

27 जुलाई 2011

मनोजय कैसे हो ?

मनोजय कैसे हो? कैसे करें यह प्रश्न नहीं है | करना यह मन के दायरेमे आता है और जहाँतक मन है, मनोजय संभव नहीं|

तो मनोलय ही मनोजय है| परन्तु यह मनोलय कहाँ हो यह एक प्रश्न उठता है ? ईश्वर के नामस्मरण में रममाण हो, जब मन अपने आप शांत हो जाता है, वाणी का बोलना बंद होता है यही मनोलय है | मन रहा ही नहीं तो विजय किसपे प्राप्त करेंगे | मनसे लड़नेसे मनोजय संभव नहीं|

15 जुलाई 2011

कविता: राम राम है पति मेरो

अभी कुछ दिनों पहले मीरा’ चलचित्र देखा| संत मीराजी के बारे में कुछ भी पढ़ें, सुनें, प्रेम और भक्ति से आँखों में अश्रुपात होने लगता है|

08 जुलाई 2011

दोस्ती की मिठास

आषाढ शुक्ल प्रतिपदा महाकवी कालिदास की जयंती है ........आपने सुना ही होगा "आषाढस्य प्रथमे दिवसे..."

कालीदास के महान नाटक और मनोरम दृश्य - काव्य हमारी संस्कृती की धरोहर है | उनकी रचनाए अभीज्ञान शाकुन्तलम, मेघदूतम सब प्रसिद्ध ही है |

बस् आज कुछ ऐसा प्रस्तुत कर रहें हैं की आपको उस जमाने की याद आ जाएगी | कालीदास के सामने तो हम धूल भी नही है परंतु......मित्रता और प्रेम यह तो कालातीत सत्य हैं, कभी उन्होने लिखे थे, आज कोई और लिख रहा है,

तो कथा ऐसी है,

26 जून 2011

जीवनकाव्य बना चैतन्यपूजा

मेरा अंग्रेजी ब्लाग गुरुकृपा ४ जुलाई २०११ को एक वर्ष पूरा कर रहा है | मेरा मराठी ब्लाग विचारयज्ञ और यह चैतन्यपूजा गुरुकृपा का ही अंग है | यह सब मेरे सपनोंका सफ़र है | ईश्वर और परम पूजनीय सद्गुरुदेव श्री नारायणकाका महाराज की कृपा से पहला काव्य स्फुरित हुआ मेरे 'राघव' पे और फिर गुरुकृपा पे | ब्लॉग का प्रारंभ भी ऐसेही हुआ - नाम गुरुकृपा और पहला आलेख राघव पे | 

यह संयोग है या ईश्वर की इच्छा ? 

इस सफ़र की और मेरे जीवन की यांदें इस काव्य में .........

मेरे लिए यह उपलब्धी अति महत्वपूर्ण और विशिष्ट है, क्योंकि मेरा यह सफ़र

अँधेरे से प्रकाश का सफ़र है,
अंतरमें  और जीवन में चल रहे संघर्ष से अमिट ज्ञान का सफ़र है .........
करोड़ों निराश और बुझते ह्रदयों में आशा का प्रकाश फैलाने वाला सफ़र है ..............इसकी शुरुवात बचपन से हुई थी, ब्लागिंग बस नया माध्यम है ........




अकेली चल पड़ी थी इक राह पे 
थाम के हाथ राघव का 
अँधेरा था सामने मगर 
पैर ना थके ना रुके इस डगर पर 
भय नहीं था अँधेरे का 
जब साथ था मेरे राघव का 
अँधेरे में सब ओर दिखा  
महारूप व्याप्त महाकाली का 
काली वह माता महाकाली 
सृष्टि स्थिति प्रलय करनेवाली 
माता मेरी महाकाली 
ह्रदय में भरा प्रेम था इस राह पे 
पथ पे चलने का दृढ़ निश्चय था 
भय नहीं था मुझे जराभी किसीका 
क्योंकि साथ जो था मेरे राघव का 
राघव ने सँभाला हर पग पर 
ह्रदय को पावन किया हर क्षण पर 
ह्रदय विशुद्ध बना 
अमिट ज्ञान फिर प्रगटा
प्रेम की सौगात बनकर 
गुरुकृपा का नव आविष्कार हुआ 
फिर चैतन्यपूजा बनकर
पूजा शुरू हुई अखिल ब्रह्माण्ड की
अँधेरा मिट के प्रकाश फैला
आँख खुली ज्ञान की
घर तो पाया मंजिल पे ही
क्योंकि
हाथ जो उसने थामा था
राघव ने जो साथ दिया था
साथ चले साथ रुके
साथ हँसे, साथ रोये
प्यार ऐसा अनुपम मिला
राघव का साथ जो
इस जीवन को मिला
राघव अब हर श्वास में बस गया
राघव मेरे हर शब्द से बोल उठा
बस एकही गीत अब
ह्रदय बोल उठा
"राघव राघव हर कण में
राघव ही मेरे जीवन में"

साथ रोयें? क्या भगवान भी कभी रोतें हैं? -  हमें भगवान की याद में आसूं आयें तो क्या भगवान हमारे प्यार में नहीं रो सकते ? हमारा प्यार शायद मीराजी जैसा ना हो, पर हैं तो हम भी भगवान की ही, हमारे राघव के ही .......

इस सफ़र में आप सब ने साथ दिया बहुत प्रेम दिया | आप सब ईश्वर के अनंत रूप हैं..........

आप सबको मेरा ह्रदय से करोड़ों बार नमन | ऐसाही साथ देते रहिएगा.....

पहले यह जीवन पथ  अकेला था जो 'मैं' ने चुना था, अब यह जीवन पथ  जो 'ईश्वर' ने चुना है, आप सब के साथ विशाल राज पथ बन गया है ....... |


इसी स्वर्णिम सफ़र की अब तक प्रकाशित हुई स्वर्णिम यादें ..............
Awards of Love - Pt 3
Awards of Love - Pt 2
Awards of Love - Pt 1
Countdown to Birthday of Gurukripa  

प्रतिमा सौजन्य : भक्तिमयी WebSite : http://www.bvml.org/SBBTM/sra.htmltarget="_blank" Sri Ramacandra-avatara  by Srila Bhakti Ballabh Tirtha Maharaja इनको मेरा सहस्रों नमन !

17 जून 2011

जम्मू और कश्मीर पर PPT



यह PPT शांतनु भागवत जी द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तुत  की गयी है | मेरा यह सौभाग्य है की उन्होंने मुझे इस हिंदी में अनुवादिंत करने का सुअवसर प्रदान किया | यह अनुवाद आपके सामने प्रस्तुत करने में मुझे हर्ष हो रहा है | कृपया इसे अपने मित्रों के साथ अवश्य बाटें | इस अनुवाद को स्वत: शांतनु जी ने ही इसमें सुधार करके  के परिपूर्ण बनाया है | मैं बहुत आभारी हूँ शांतनु भागवत जी की इस सुअवसर को प्रदान करने के लिए|  मूल आलेख कृपया यहाँ देखें A Primer on Jammu and Kashmir In Hindi..

इस अनुवाद में मुझे शब्दकोश. कॉम और गूगल translate की सहायता मिली | आभार इनका |

J & K presentation in Hindi
View more presentations from Mohini Puranik

इसे आप PDF रूप में Download करने के लिए कृपया यहाँ Click करें  जम्मू और कश्मीर PPT हिंदी में  | 

कृपया इसे बाँट  केअधिक से अधिक लोगों तक तथ्य पहुचाएं |

09 जून 2011

दम घुटता है यहाँ अब

मेरे ह्रदय की, एक आम भारतीय के ह्रदय की पीड़ा मैंने आपके समक्ष रखने का प्रयत्न किया है| मेरा ना किसी राजनैतिक पक्ष से लगाव है, न किसी संगठन से| कोई भी राष्ट्रहित का काम करें तो प्रशंसनीय हैं और राष्ट्रद्रोही बहिष्कार के योग्य हैं| 


 दम घुटता है यहाँ अब
जहाँ स्वातंत्र्य नहीं अभिव्यक्ति का
दम घुटता है यहाँ अब
जहाँ बोलबाला है

19 मई 2011

कविता: कदमो में है जहाँ तुम्हारे

एक अलग भाव लेकर यह कविता आयी है जीवन में कभी कभी या बहुत बार, हम आपने आप को औरों से कम , हारा हुआ मानते हैं कभी कभी किसीके अपमानित करने पर या हमें तुच्छ ठहराने पर हम अन्दर से टूट जाते हैं, जब हमें तोड़नेवाले हमारे ही स्वजन हों, तब तो उठना और लक्ष्य की ओर बढ़ना असंभव सा हो जाता है पर यह तो सब एक भ्रम है किसी भी कारण से हो पर रुकना और अपने आपको हारा हुआ मानना अपनी ही मूर्खता है अपने विस्मृत आत्मविश्वास को और आत्मस्वरूप की याद दिलानेवाली यह कविता  आपको जरूर भाएगी

03 मई 2011

एक आसूँ भोलासा

अब तक की कविताओं में बहुत ख़ुशी और प्रेम था, पता नहीं क्यों और कैसे पर ह्रदय आज रो उठा और एक आसूँ भोलासा यह काव्य बोल उठा ................


पता नहीं खुश थी या दु:खी
हस रही थी या सोच रही थी 
दुःख दर्द मिले ऐसे जीवन में 
की रोना ही भूल गयी 
हाँ, रोना भी भूल गयी 
लोग हँसना भूलते है 

27 अप्रैल 2011

अगर तुम न होते 'दीपक'

आज मेरे प्यारे भाई दीपक का जन्मदिवस है | दीपक ! यह काव्य पंक्तियों का पुष्पगुच्छ एक अलगसा उपहार तुम्हारे लिए ! और यह पोस्टर भी मैंने ही बनाया है, एक छोटासा प्रयत्न, तुम्हारे जन्मदिन का और जीवन का  हर पल कुछ खास बनाने का ! नीला रंग मेरा सबसे प्यारा है इसलिए यही चुना ! दीपक! तुम्हे और आप सबको यह कैसा लगा? कुछ और उपहार बनाने थे, पर कुछ मुश्किलें आयी और वह हो न पाया !


Posted by Picasa



अगर तुम न होते 'दीपक'
कौन मुझे रुलाता
लड लड के तुम जैसा
और कौन मुझे चिडाता
अगर तुम न होते 'दीपक'
कौन मुझे पागल जैसा हॅँसाता
प्यार जो तुमने मुझे दिया है
बचपन मेरा फिर लौटाया है
अगर तुम न होते 'दीपक'
कौन यह प्रेम जीवन मे लाता
ईश्वर ने भेजा है तुझको
मुस्कान मेरी ऐसीही खिलने के लिये
प्यार की सौगात यह प्यारी प्यारी
दुनिया में फैलाने के लिये
अगर तुम न होते 'दीपक'
किसे फिर मै परेशान करती
लड लड के किसे मै ऐसे चिडाती
अगर तुम न होते 'दीपक'
पागलपन मेरा कौन सँभालता
गुस्सा मेरा बच्चों जैसा
और प्यार से कौन समझता
अगर तुम न होते 'दीपक'
कौन डाँटके खाना खिलाता
मेरे लक्ष्योंकी की याद मुझे
तुम्हारे बिना कौन दिलाता
अगर तुम न होते 'दीपक'
अगर तुम न होते 'दीपक'


"मेरा प्यारा दीपक!  मेरी उमर भी तुम्हे लग जाये!!!"


मुझे पता है, यह पढके तुम कहोगे,"तुम पागल हो!" पर हाँ! वो तो मैं हूँ ही! एक और बात,
"एक शिकायत थी भगवानसे
'दीपक' को बचपन में
क्यों नही मिलाया?
भगवानने कहा,
बचपन तुम्हारा फिरसे लौटाने
'दीपक' को हि तो बनाया!!"
दीपक पे तो रोज भी एक कविता लिखी तो कम ही है , पर फिलहाल  इसके अलावा एक और कविता है, Life is So Beautiful When... आप  सबको वह भी अतिशय अच्छी लगेगी |




I love you sooooooooooooo Muchhhhhhhhhhhhhhh Deepak!!!!!!!!!!!!!
May God bless you and all your dreams come true and mine too to meet you!




P.S.: "This Poem has been written for BLOGJUNTA NaPoWriMo"  Here is the link of that happening place where we get new inspirations to write more and more. www.blogjunta.com

And if you love this poem and wanna express it, you can fav it by clicking HERE!

16 अप्रैल 2011

'सिमरन'

सिमरन तू इतनी प्यारी है , की मुझे क्या लिखूं समझ में ही नही आ रहा , फिर भी जन्मदिन पे मेरे ह्रदय से चुने हुए यह प्यारे से शब्द पुष्प तुम्हारे जीवन के लिए ! 




एक गुडिया प्यारिसी 
दोस्त मेरी भोलिसी

03 अप्रैल 2011

नव वर्ष लाया नव आल्हाद !

||श्री श्री गुरवे नमः ||

नववर्ष की आप सब को हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएँ! इस नव वर्ष मे कुछ संकल्प है, नये कुछ निश्चय है , नयी आशाये है, यह सब आपके साथ बाट रही हुं | यह व्यक्तिगत और सामाजिक जीवनसे भी संबंधित है | 

बडे बडे संकल्प सामाजिक हो या व्यक्तिगत आप सबके प्रोत्साहन प्रेम और सहयोग बिना पूर्ण होना असंभव सा है | आपमे विराजमान भगवान से प्रार्थना है, मुझे यश के शिखर तक हसते हसते हि सहज हि पहुंचा दे |

आइये! इस नव वर्षा मे हम सब जुड जाते है , चैतन्यपूजा मे, मानवता की, विश्वप्रेम की विश्वबंधुता की पूजा मे |  कलियुग मे तो संघ शक्ती का हि महत्व है | 


अब विश्व बंधुता के इस नये पूजन मे मुझे आप सबका सहयोग चाहिये | महायोग - सिद्धयोग और उसका दीक्षा पूर्व पूर्वाभ्यास मानवता और विश्व शांती के लिये कैसे आवश्यक है इसका विवेचन आगे नव वर्ष में देखेंगे |  

आप अपने नव वर्ष संकल्प यहाँ अवश्य बताइयेगा| मै राह देख रही हूँ !

यह सबसे लम्बी पुष्पमाला लगनी चाहिये | :)







नव वर्ष यह आल्हाद और उमंग का 
प्रेम की मीठी सौगात का 
आशाओंका निराशाओंका 
उनके भी परे प्रेमाभक्ति का
नववर्ष नए सृजन का
सृष्टि के सृजन महोत्सव का
नव वर्ष मीठी प्यास का
नव वर्ष मिलन की आस का
नव वर्ष नव प्रतीक्षा  का
नव वर्ष यह नव प्रेम का
नव वर्ष पुनर्मिलन का
नव वर्ष एक गीत जीवन का
नव संकल्प का, परिणय का
नव वर्ष नव सौंदर्य, नव माधुर्य का 
पुराने प्रियतम के मिलन का
नव वर्ष यह इच्छा का
नव वर्ष यह देशसेवा का
नव वर्ष नव आल्हाद और उमंग का
नव वर्ष एक संजीवनी
यश शिखर पर पहुँचने का
नव वर्ष गीत एक पुराना
यश कर्तृत्व देश गान का
नव वर्ष अनेक उम्मिदोंका
नव वर्ष नव नव साहस का
नव वर्ष एक संकल्प
नव भारत वर्ष बनाने का
गत वैभव पुन: लाने का
विश्व विजयी होने का
हाँ ! नव वर्ष विजयी होने का
नव वर्ष विजयी रहने का
ध्येय पर अडिग रहके
पथ यश का चलने का
नव वर्ष एक ऐसे साहस का
जो नव मंथन का बने सर्जक
नव वर्ष बीती बातें भूलने का
कडवे पल को मिठास से धोने का
नव वर्ष अपयश से सिखने का
नव वर्ष नव आल्हाद का
नव वर्ष नव सृजन का
सृजन नव 'स्व' का
अविष्कार पूर्ण आत्मा का
नव वर्ष नव कर्म करने का
जीवन नव आनंद बनाने का
नव नर्ष नव आशा लाने का
नव वर्ष नव हर्ष लाने का
आस छोड़ी जिन्होंने जीने की
नव चेतना उनमे जगाने का
नव वर्ष विश्व बंधुता का
नव वर्ष प्रेम और शांति का
नव वर्ष नव भाईचारे का
मिटे हर द्वेष उस प्यारे प्रेम का
नव वर्ष एक सदिच्छा का
हर ओर पुष्प खिले प्रेम का
नव वर्ष नव सृजन का
नवदेवता यह प्रेम का
नव वर्ष मीठी प्यास का
नव वर्ष मिलन की आस का
नव वर्ष नव प्रतीक्षा  का
नव वर्ष नव आस्था का
नव वर्ष एक आदर्श जीवन का
सपना मेरा पूर्ण जीवन का
बस हो हर क्षण कृष्ण भक्ति का
बस हो हर क्षण कृष्ण भक्ति का

आने वाले नौ दिनों में होने वाले भक्तिमय श्रीरामचरितमानस पारायण के लिए भी आप सबको ह्रदय से शुभकामनाएं !  आपका पारायण निर्विघ्न पूर्ण हो यह श्रीरामजी से प्रार्थना !


26 मार्च 2011

प्रेमाभक्ती - एक नयी अभिव्यक्ती

प्रेमाभक्ति की हुई यह कैसी अभिव्यक्ति! 


प्रेमाभक्ति सब भुला देती है, 
आशा निराशा से परे आनंद देती है
जीवन में बस आनंद ही आनंद देती है
प्रेमा भक्ति यह सबसे न्यारी

25 मार्च 2011

श्यामा श्याम प्रेम गीत


नयी नवेली दुल्हन जैसी 
श्यामा मेरी सुंदर सखी 
श्याम संग रास खेले 
श्यामा मेरी प्यारी रानी 
रानी रानी तू हि रानी 
राधे रानी मेरी सखी 
श्यामा श्यामा हृदय पुकारे
श्यामाबिन मन कही न लागे 
श्याम मेरा पिया सखा तू
मै भी पुकारू श्याम श्याम रे 
श्याम तू मुझे तडपाये   
मेरा मन तुझमे हि लागे 
मेरा मन तेरा मन 
एक हृदय यह गीत गाये 
प्रेम गीत यह तेरे प्रेम का 
दुनिया मे हर कोई गाये 
क्या यह जादू तुने किया है 
मन बावरा तुझेहि पुकारे 
तेरे मिलन के आस मे 
तेरे प्रेम की प्यास मे 
दुनिया मै भुला बैठी 
फिर भी तु मुझे सताये 
सताना है प्यार तेरा 
दिल मेरा बात यह जाने 
कैसे तुने मोह लिया रे  
चैन मेरा छीन लिया रे 
श्याम सवेरे तुझे हि खोजू 
पनघट पे मै तुझे खोजू 
मिठी बोली कैसे तू बोले 
श्यामा मुझे तू मोह ले 
तेरी मोहीनी ऐसी रानी 
हृदय मे मेरे तू हि बोले 
जगमे जहां जहां भी जाऊं  
राधे राधे गाता रहूँ 
तुझ बिन मेरा श्वास न जाये 
राधे तू तो मुझे सताये 
तेरी मेरी प्रेम कहानी 
दुनिया इसे कभी न जाने

यह प्रेम गीत कभी समाप्त नहीं होगा, आगे फिर कभी देखेंगे कुछ और प्यारे प्यारे शब्दपुष्प ! 


21 मार्च 2011

होली खेली आज कान्हा संग

होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं ! मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रतिमा धुले के बी. ए. पी. एस. स्वामीनारायण मंदिर में विराजमान श्री घनश्याम महाराज की है श्री स्वामीनारायण भगवान का यह बाल - रूप है  मुझे अधिक तो पता नहीं, परन्तु मेरे लिए यह मेरे कान्हाजी हैं

कुछ लिखने आज चली थी
कान्हा ने भी बात कर ली 
मै तो हरख हरख पागल हुई 

08 मार्च 2011

मीरा बनू मै राधा बनू

महिला दिवस की आप सबको हार्दिक बधाई | हमेशा की तरह आज फिर से कुछ मेरे बारे में, जीवन के बारे में आप सब के साथ बाट रही हूँ | आपका क्या कहना है, इस सपने के बारे में ? 


मीरा बनू मै राधा बनू 
कान्हा तेरी मै प्रिया बनू ||
कृपा हो तेरी ऐसी मुझे, 
तेरी सदा मै प्रिया बनू ||
दुर्गा बनू मै काली बनू ,
असुरोको संहारनेवाली बनू || 
कृपा हो तेरी ऐसी मुझे,
तेरी गाथा मै गाती रहूँ ||


जो स्त्री मीरा, राधा जैसी सौम्य सुन्दर और  शांत है वह समय पड़ने पे दुर्गा या कालि बन सकती है, असुरोंका विनाश भी कर सकती है | असुर कौन है , मानवता का, स्त्री के स्त्रीत्व का अपमान करने वाले, मातृत्व का अपमान करनेवाले, भ्रूण हत्या करनेवाले, और तो क्या हर युवती एक मानव न होके सिर्फ एक शरीर है  यह माननेवाले | इन सबके विरुद्ध वह नारी दुर्गा है | 

यह बात पुरुषों और स्त्रियोने भी जाननी और माननी चाहिए |  हमारे विचार अगर बदले तो हर अन्याय , अत्याचार को होने से पहले ही रोका जा सकता है | 

और एक बात, केवल शरीर को महत्व देकर, युवतियोने अपनी अस्मिता और गरिमा को स्वत: ही नष्ट नहीं करना चाहिए | यह एक मानसिक गुलामी है | और शोषण भी | 

हम सब मानवता के पुजारी बने | मातृत्व के पुजारी बने | न की अंध वासना के शिकार बने | प्रेम में आदर होता है, वासना में अहंकार!

जीवन की सुन्दरता प्रेम और आदर के इन्ही आदर्शोंमे है | हम जिसे सभ्यता और आधुनिकता समझ रहे है , उसके पीछे भागते भागते हम जीवन की सुन्दरता और शांति भूल गए है | 

मेरा करोडो प्रणाम उन माताओं को जिन्होंने यह विश्व प्रेम, विश्वास, त्याग, समर्पण  से समृद्ध, सुन्दर और शांतिपूर्ण किया |

हे विश्ववन्द्य मात : मेरा तुझको सदैव नमन |

यह भावपुष्प मीरा , राधा, दुर्गा, काली, सरस्वती, सीता जैसी अनगिनत नारियोंको को, सच्ची देवियोको अर्पण! मातृत्व को अर्पण!




20 फ़रवरी 2011

नमस्ते नमस्ते प्रभो लोकनाथ |


आज मेरे सद्गुरुदेव परम पूजनीय श्री नारायणकाका महाराज जी के सद्गुरू , मेरे परम गुरु परमहंस परिव्राजकाचार्य १००८ श्री लोकनाथ तीर्थ स्वामी महाराज, जिनको की हम सब प्रेम से स्वामी महाराज बोलते हैं , उनकी पुण्यतिथि है  सिद्धयोग ( महायोग ) की चैतन्यगंगा इन्होने हि महाराष्ट्र मे लायी जिसके कारण आज हम विश्वबन्धुता के प्रसार हेतु इस चैतन्यपुजा में जुड़े हैं

 माँ भगवती ने उनको आदेश दिया 'दक्षिण को चलो' और वे इस मराठी देश में आये मेरे गुरुदेव को जब वे अभियांत्रिकी महाविद्यालय में थे, तब स्वामी महाराज जी से दीक्षा प्राप्त हुई 

स्वामी महाराज जी का जीवन वास्तव में सन्यासी जीवन के नियमोसे परिपूर्ण था, जो की आज के समयमे दुर्लभ सा हो गया है कोई पालन करना भी चाहे तो तो भी यह असंभव सा प्रतीत होता है उनकी कठोर परन्तु उनके लिए सहज ऐसी साधना - तपस्या आज के समय में करना शायद ही संभव हो

स्वामिमहाराज जी के बारेमे तो जितना लिखा जाए कम ही है  उनकी प्रतिमा देख के मन ऐसा शांत हो गया , की कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है तपस्या से - विशुद्ध जीवन से - साधना से जो चैतन्य प्रकट होता है , उसका अनुभव सदा रहता है , यही यह प्रतिमा देखके मन में आ रहा है स्वामी महाराज हम सबके बीच ही है आप भगवान को माने या न माने , पर स्वामी महाराज जी की यह प्रतिमा देख के एक अद्भुत शांति का अनुभव आपको अवश्य होगा

इस प्रतिमा को प्रकाशित करने की अनुमति देनेके के लिए मै प.प. श्री लोकनाथ तीर्थ स्वामी महाराज महायोग ट्रस्ट (नाशिक)की मै ह्रदय से आभारी हूँ

सिद्धयोग के इस सहज तम पथ पे सद्गुरु देव की सच्ची सेवा तो साधना में नियम से बैठना और सिद्धयोग का विश्व बंधुता का सन्देश प्राणिमात्र तक पहुँचाना बस यही है 

जीवन के भयंकर संघर्षमय पथ पे भी शांत सहज जीवन की प्राप्ति सिद्धयोग से ही मुझे हुई है

मेरे सदगुरुदेव मेरी ही नहीं विश्व की भी माता है और  स्वामी महाराज जी उनकी भी माता उनके सद्गुरु ! आजे के दिन उनकी सेवा किस प्रकार हो सकती है, कुछ सोचा नहीं था, माँ भगवती की कृपा से एक संस्कृत स्तोत्र स्फुरित हुआ फिर मन में आया, यही तो सच्ची सेवा है , मेरी मातृभाषा मराठी है, और सारी भाषाओंकी माता संस्कृत है मेरी माता की भी माता आज प्रथम ही आपके समक्ष कुछ संस्कृत प्रस्तुत कर रही हूँ मैं थोड़ी सी संस्कृत सीखी हूँ , परन्तु इतनी नहीं की संस्कृत में रचना कर सकूँसद्गुरुदेव की , परम गुरुदेव की कृपा क्या होती है , इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है ! आज एक और भाषा में प्रवेश हो रहा है स्वामी महाराज जी के , सद्गुरु रूपी माँ के और सदगुरुदेव के ही अनंत रूप आप सब के चरणों में प्रार्थना है , की ऐसेही सेवा इस बालिका से होती रहे

विश्व बंधुत्व दिवस के विषय में आगे लिखती रहूंगी

काव्य अति सहज और सरल है , इसलिए इसका अनुवाद नहीं लिख रही हूँ 



प्रतिमा सौजन्य: http://mahayoga.org/


नमस्ते नमस्ते प्रभो लोकनाथ |
नमस्ते नमस्ते प्रभो विश्वनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे प्राणनाथ |
नमस्ते नमस्ते सदा एकनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे शक्तीनाथ |
नमस्ते नमस्ते हे जगन्नाथ ||

नमस्ते नमस्ते गुरो नारायण |
नमस्ते नमस्ते सदगुरो लोकनाथ ||

नमस्ते नमस्ते हे जगद्गुरो |
नमस्ते नमस्ते हे परम सदगुरो ||

पाहि पाहि हे प्रभो लोकनाथ |
पाहि पाहि हे विभो विश्वनाथ ||



आपको मेरे शब्द सुन्दर प्रतीत होते हैं, पर इसमें मेरा कर्तृत्व नहीं , मेरे गुरुदेवकी कृपा और उनका मेरे जीवन पे प्रभाव ही कारण है इसलिए आप प्रशंसा करते हैं तो मुझे बहुत संकोच होता है

09 फ़रवरी 2011

और भी कुछ अच्छा लगता है ............


इस काव्य का पूर्व भाव  कुछ अच्छा लगता है पहले अवश्य अनुभव करियेगा |

बहुत समय बाद  कुछ अच्छा लगता है ............फिरसे प्रस्तुत कर रही हूँ |  जो प्रस्तुत कर रहे हैं, वैसा भाव मन में न हो तो मन के भावों के विपरीत काव्य प्रस्तुत करना एक तरह की मजबूरी लगती है | हम तो यहाँ पूजा करने आते हैं | मजबूरी काहे की  ! और समय के साथ मंदिर का स्वरुप भी कुछ नया सा है | हो भी क्यों ना | हमारे मनमे सहज ही भक्तिभाव जागृत हो चराचर में व्याप्त चैतन्य के लिए . तो हर काम पूजा बन जाता है और जहाँ भी हम हो वही मंदिर बन जाता है | यह ब्लॉग तो मंदिर ही है  | यहाँ आपके भी सुन्दर सुन्दर शब्द पुष्प आ रहे है | 
तो चलिए , आज देखतें हैं की हमें और क्या क्या अच्छा लगता है | देखिये!  सदगुरुदेव की कृपा कैसी होती है | मन अपने आप 'अमन' हो जाता है ........यही तो 'सच्चा नमन' है, नमन की यह व्याख्या मेरी नहीं मेरे सदगुरुदेव परम पूजनीय नारायणकाका महाराज की है | यह नमन, ईश्वर के प्रति, सबके प्रति मेरे गुरुदेव के असंख्य रूप आप सबके प्रति  |

तुलसी का वह पौधा 
कितना अच्छा लगता है 

एक बालक भोलासा 
बहुत अच्छा लगता है 

बालक जैसा मन हमारा 
बहुत अच्छा लगता है 

एहसास यह भोलाभाला 
बहुत अच्छा अच्छा लगता है 

काव्य रोज नया नया 
अच्छा ही लगता है 

दोस्त वह पुराना 
अच्छा ही लगता है 


प्यार एक नया नया 
अच्छा ही लगता है 


जीवनसे प्यार मनसे प्यार 
प्यारसे प्यार अच्छा लगता है

दु:ख हलका कर दे 
रुदन वह अच्छा ही लगता है 


मन का बोझ मिटा दे 
दर्शन वह ईश्वर का 
अच्छा ही लगता है 


अच्छा अच्छा सब कुछ 
ईश्वर का रूप हर ओर 
सच्चा लगता है 

मीठा मीठा यह पल 
अच्छा ही लगता है 

तृष्णा से परे तृप्त जीवन 
खूब अच्छा लगता है 

निराशा का एक बादल 
वह भी अच्छा लगता है 

आशा यश प्रेम की वर्षा 
सब कुछ अच्छा लगता है 

चंद्र तारे निशा अन्धीयारी 
सब कुछ अच्छा लगता है 

अमावास की रात काली 
काली मा का यह स्वरूप 
अच्छा लगता है 

भीषण अंध:कार भी 
नयासा लगता है 
अंधकार भी देता है 
शक्ती प्रकाश ढुन्ढनेकी 
इसलिये प्रकाश के साथ 
तिमिर भी अच्छा लगता है 

बस बस क्या कहू 
सबसे बाते करना 
अच्छा ही लगता है 

प्रेमकी सौरभ हर दिशामे 
फैले, एक काम यह 
अच्छा लगता है 

संदेश विश्वबंधुता का 
सद्गुरुजीने जो दिया 
अब इसे फैलाना 
बस् यही
 अच्छा लगता है

स्वप्न यह आज वास्तव 
मनको बडा अच्छा लगता है 

हिंदी यह नव जींवन 
अच्छा लगता है 

दत्त का यह स्मरण 
अच्छा लगता है 

भाव हर पल नयासा 
अच्छा लगता है 

ब्लाग यह नया नया 
अच्छा लगता है 

श्रीरामसे मिलन हुआ
जीवन अब सार्थक लगता है 

क्या लगता क्या नही लगता 
मनसे परे अमन हो 
नमन यह... नमन यह.....

तालाब वह शांतसा 
मन बन गया हंस सा 

सूर्य का प्रकाश यह 
अब अच्छा लगता है 

मधुर संगीत निसर्ग का 
अच्छा लगता है 

आशा निराशा से परे 
जीवन यह 
अच्छा लगता है 

ज्ञान यह नया नया सा 
अच्छा लगता है 

कार्य पूर्ण हुआ मनका 
अच्छा लगता है 

मन भोलासा कोई 
बच्चा लगता है 

स्मरण आज दादिका 
बहुत अच्छा लगता है 

ईश्वर की देन यह प्राण मेरा 
अच्छा लगता है 

तन मन अर्पण ईश्वरको 
सपना यह सच्चा लगता है 

भक्ति का रूप यह नया
आज फिरसे अच्छा लगता है 

बिल्लिका वह बच्चा छोटासा 
बहुत प्यारा लगता है 

थंडी हवा का स्पर्श 
अच्छा लगता है 

मौसम कोई भी हो 
खुश रहना हमें 
सदा अच्छा लगता है 
सदा अच्छा लगता है........

 सब कुछ अच्छा अच्छा हि लगता है......
सदा सब कुछ अच्छा अच्छा ही लगता है 

और 

क्या यह काव्य, 
मन का यह भाव दिव्य 
आपको 
अच्छा लगता है ?

इस काव्य का एकेक भाव इतना सुन्दर है की क्या वर्णन करूँ ! कितने सुन्दर अर्थ छिपे हैं इसमें | आपको यह तो नहीं लगेगा यह मेरी आत्म प्रशंसा है, आपको तो पता है ना, यह तो भगवान का उपहार है, नहीं तो इतना सुन्दर काव्य ऐसेही कैसे लिख देती |
तुलसी का पौधा , भोलासा बालक और बालक जैसा मेरा मन ...सब एक ही इशुधा पवित्र दर्शातें है | इसका अर्थ हमारा मन पवित्र हुआ तो सब ओर हमें पवित्रता नजर आती है और मन का ही मैल विश्व में गन्दगी दिखता है | स्वामी विवेकानंद जी की दिव्य वाणी में मैंने यह बात सदैव सुनी है (देखिये! जब भी हम स्वामीजी की बातें पढतें हैं, क्या ऐसा नहीं लगता है की वो आज भी हमसे बात करतें हैं |) की आपको अब भी दुनिया में कहीं बुराई नजर आ रही है इस बात का दुःख होना चाहिए | कुछ शब्द जैसे अभी  स्मरण हो रहें हैं , कुछ गलत हो तो क्षमा करियेगा, परन्तु उनको जो कहना है वह यही है | अब मै सोचती थी, 'मुझे तो बुराई नजर आती है, पाप नजर आता है , दुनिया में | तो क्या करूँ |' सच बताऊँ, यह लिखते समय ,अभी मुझे समझ में  आ रहा है की स्वामीजी क्या कहना चाह रहें हैं |

यहाँ गांधीजी का विषय लिखके मुझे काव्य की सुन्दर दिशा और भाव दूषित नहीं करना है | परन्तु एक प्रश्न उठता है, भलेही हमारी नजर में हर ओर पवित्रता भरी हुई है, परन्तु व्यवहार की और सामाजिक जीवन की मर्यादा अध्यात्म के नाम पे छोड़ना क्या सही होगा? मेरा कहने का अर्थ है , भगवान मेरे देशबांधव में भी है और मेरे देश के शत्रु में भी है ..सत्य है ,  और इन दोंनो की पूजा भी होनी चाहिए , पर देशबांधव की पूजा बंधुत्व से और राष्ट्रद्रोही की पूजा उसको दंड देके | मुझे थोडासा ऐसा लगता है, हम अध्यात्म पूरी तरह से उलट कर के देख रहें हैं | जो गांधीजी की दृष्टि से हम देख रहे हैं | और देश के हर प्रश्न में यह उलट दृष्टि अतिशय भयानक सिद्ध हो रही है |
इस काव्य के सारे भाव विस्तृत रूपसे प्रसिद्ध करने का प्रयत्न है, आपका सहयोग और प्रेम ऐसेही मिलता रहे | 















26 जनवरी 2011

सत्ता प्रजा की है कौनसी ?

प्रजासत्ताक दिन की आप सब को  हार्दिक बधाइयाँ ! क्षमा किजीये, परंतु मुझे य नही समज मे आ रहा की मै  किस लिए यह बोल रही हूँ , बस इस दिन सब ऐसा करतें हैं इसलिए ? जो भी कारन हो, परन्तु मेरा मन आज आनंदित नहीं हैं और मनमे अनेकानेक प्रश्न उठ रहें हैं .........

स्वतंत्रता यह है कैसी 
सत्ता प्रजा की है कौनसी 
धर्मान्धतासे लड़ने की नाम पे 
धर्मनिरपेक्षताकी हिंसा यह कैसी 
रामसे द्वेष बनके शिष्य गान्धिके 
अहिंसा के आड़ में हिंसा यह कैसी 
सैन्य के  प्राण जहाँ शत्रुओंको 
दिए जाते हैं दान में 
दानवीरता यह आधुनिक 
भारतमे आज कैसी ?
जनता है खिलौना केवल 
प्रजासत्ताक यह भूमि कैसी 
आपको ही अब है खड़े होना 
आवाज बुलंद है अब करना 
हम नहीं हैं कमजोर 
हम नहीं है नपुंसक 
क्यों नहीं दिखाते 
विश्वको स्वरूप अपना 
रोका है आपको किसने 
विचारोंको आपको है बदलना 
आग है ह्रदयमें, बाजुओमे दम हैं 
हार के फिर भी बैठे आज क्यों हम हैं 
उठो मेरे वीर सपूतो 
भारत माँ पुकार रही है
उठो मेरे वीर सपूतों 
भारत माँ पुकार रही हैं .........

बस इसके आगे कुछ नहीं लिखा जा रहा, हम देश की लिए बोल रहें हैं , हिंदुत्व के लिए नहीं, आज देशभक्ति भी अपराध हो गया हैं, मन बहुत व्यथित है | हम हमारे देश के लिए, अपना प्रेम भी अभिव्यक्त नहीं कर सकते और नाटक करतें हैं प्रजासत्ताक होने का ? ...............आज कुछ नहीं लिखा जा रहा ...........

यदि आप इन विचारोंसे सहमत हो तो कृपया इसे Indivine पे प्रोत्साहित करें और देश्भक्तिका सन्देश अपने बंधुओ तक  पहुचाये कृपया क्लिक करें यहाँ   (आपका बहुत बहुत धन्यवाद !)

10 जनवरी 2011

विरहवेदना

'कुछ अच्छा लगता है' यह अभी अधुरा है....परन्तु मन के भाव बदलते रहते है...आज का काव्य कुछ और भाव का है | सीताजी जब अशोकवनमें थी...प्रभु श्रीराम से दूर हर क्षण विरह वेदना से पीड़ित| उनके मन की अवस्था कैसी होगी| अनेको बार रामायण की कथा पढ़ी सुनी है हम सबने | पर एक एक प्रसंग पर गहराई से मनन चिंतन हो तो लगता है ....माँ सीताजी की अवस्था कैसी होगी ......राम के बिना |