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26 नवंबर 2010

उठा वह गांडीव

आजसे दो वर्ष पूर्व मुंबई पे एक और भयंकर दहशतवादी हमला हुआ था | इसी पार्श्वभूमी पे यह काव्य है | देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को अबाधित रखने का कार्य और कर्तव्य केवल भारतीय सैन्य का नही, वरन हम में से हर एक का है |

अर्जुन का प्रिय शस्त्र था गांडीव| हमारे पास भी ऐसे शस्त्र है जिनसे हम देशकी सुरक्षा में योगदान , महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है |

सोचीये आप के पास कौनसा शस्त्र है?

वह शस्त्र हो सकता है त्याग का ,सत्य का, निष्ठा का! वह हो सकता है तपस्या का! वह शस्त्र हो सकता है कलम का जो लोगोंको जाग्रत करे! हो सकता है आंतरताने का , या ब्लाग का ! वह शस्त्र  हो सकता है बहिष्कार का! देशद्रोहीयो को  पहचानो और बहिष्कृत करो |

कोई आवश्यकता नही है न्यायव्यवस्था तोडने की| कानून की सीमा में रहके भी यह हो सकता है| हिंदुत्व अब बदनाम नही होगा! वरन होगा एक आदर्श  विश्व के लिये !

झुकना पडेगा सबको सत्य के सामर्थ्य के आगे !

आओ ! कार्य संस्कृती के साथ देशकी संस्कृती की रक्षा करे|

हम नही बनेंगे 'मनमोहक' बातें करनेवाले जो बस सबके मन को प्रसन्न करती है !

यह काव्य श्रीमद्भगवद्गीता पार आधारीत है | जब  धर्म और न्याय कि रक्षा के लिये कुरुक्षेत्र का महा युद्ध आरंभ होनेवाला था, अचानक अर्जुन  को मोह उत्पन्न हुआ, उन्होंने शस्त्र रख दिए, तब श्रीमद्भागवद्गीता का जन्म हुआ, साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के मुखकमल से!
उसीका भाव इस काव्य में




उठा वह गांडीव और 
खड़ा रह युद्ध को 

आज्ञा है मेरी तुम्हे 
मार उन अधर्मियों को  

धर्मंरक्षण कर्त्तव्य तेरा 
सोचते रहना अब नहीं 

ईश्वर ने भेजा है तुझे 
कार्य के लिए इसी 

कर्त्तव्य छोड़के जीना 
कलंक होगा कीर्तिको तेरे 

ज्ञान मुझे बता रहा जो तू 
अज्ञान वह सत्य है 

अब करो वही जो
ज्ञान सनातन सत्य है 

क्षत्रियोंको न शिष्य - गुरु
क्षत्रियोंको न पुत्र - पिता

युद्ध कर्त्तव्य क्षत्रिय का  
स्मरण कर इस सत्य को

भूल गया तू धर्मं तेरा
भूल गया तू जन्म तेरा

अमानुष वह कर्म तेरे
भूल गया क्या बता मुझे

बोलना तेरा यह मूर्खता
वीरताको कलंक है

क्लैब्य पकडके बैठना
वीरताको कलंक है
तेरे जीवनको कलंक है

ऊठ ऊठ अतिशीघ्र ऊठ
व्यर्थ समय अब मत गवा

कर्त्तव्य तेरा सामने है
इससे दूर भागो नहीं

पुनः पुनः है वचन मेरा
विजय युद्ध में है तुम्हारा

अधर्मसे यह पहलेही मरे है
समाप्त करना इन्हें अब काम तेरा

अविचल खड़ा ध्येय पे रह
चंचलता स्वभाव नहीं तेरा

बात मेरी अब सुन
संन्यास नहीं कर्त्तव्य  तेरा

झूठा है यह ज्ञान तेरा
उपजा जो मोह से

सत्य है बस यही
युद्ध अब अधर्मसे

देख उन दीन जनोंको
जो राह तेरी देख रहे है

उनके लिये है जीना
कर्तव्य सत्य तेरा
उनके  लिए है युद्ध करना
कर्त्तव्य सत्य तेरा

  
अगर आपके हृदयमे यह अग्नि है तो इसे और प्रज्वलित करें और कराएँ जनताके हृदयमे ! धर्मं और अधर्म के बीच का अंतर जानिये| धर्मनिरपेक्ष बनते बनते अधर्म का साथ देनेकी भूल हमसे न हो |  



( यहाँ अर्जुन के विषय में अमानुष कर्म कहा गया है जो इस अर्थसे है - अर्जुन के कर्म मानवी मर्यादाओं से परे थे , अर्जुनने साक्षात् भगवान शंकर को युद्ध में तृप्त करना, जीवित ही स्वर्ग जाना,  अस्त्र प्राप्ति, और भी अनेक ऐसे  ) 



अद्यतन : अंत की दो पंकियाँ आज मोक्षदा एकादशी - अर्थात गीता जयंती के पर्व पर समाहित की गयी है| साथ ही प्रतिमा भी समाहित की गयी है| दि. ६/१२/२०११ .

8 टिप्‍पणियां:

  1. bilkul sahi kaha aapne....Jagrut hone aur dusro ko jagrut karne ka yehi samay hai....bahut sundar vichaar...aur sundar kavya...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप इस काव्य से प्रभावित हुए...यह सुनके बहुत प्रसन्नता हुई| हृदयसे धन्यवाद नटवरजी|

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  3. यह कहना आसान लगता है पर करना बहुत कठिन है | हम कैसे सब कुछ भूलकर आगे बाद सकते हैं |
    आपकी रचना निश्चित रूप से प्रभावित करती है | मैं आपसे और बेह्टर कला की उम्मीद करता रहूँगा |

    कभी तो साथ चलो

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  4. नमस्ते गौरवजी| चैतन्यपुजा मे आपका हार्दिक स्वागत है| मेरे नेट संपर्क की परेशानी के कारण अतिशय विलंब हुआ, आपको उत्तर देने मे आशा है आप अवश्य क्षमा करेंगे|
    >>हम कैसे सब कुछ भूलकर आगे बाद सकते हैं, इसका अर्थ मेरी समज मे नही आया|
    आप प्रभावित हुये यह बहुत आनंददयी है| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  5. नमस्ते गौरवजी| चैतन्यपुजा मे आपका हार्दिक स्वागत है| मेरे नेट संपर्क की परेशानी के कारण अतिशय विलंब हुआ, आपको उत्तर देने मे आशा है आप अवश्य क्षमा करेंगे|
    >>हम कैसे सब कुछ भूलकर आगे बाद सकते हैं, इसका अर्थ मेरी समज मे नही आया|
    आप प्रभावित हुये यह बहुत आनंददयी है| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  6. bilkul sahi kaha aapne....Jagrut hone aur dusro ko jagrut karne ka yehi samay hai....bahut sundar vichaar...aur sundar kavya...

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  7. Hi Mohini...
    Read ur poem, this one and the two others you posted on the forum on indiblog...well written must say. You use vocabulary which is easily understood.
    I have a blog of my own, very new...visit it and temme if you like it.
    http://parthkikavita.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

चैतन्यपूजा मे आपके सुंदर और पवित्र शब्दपुष्प.........!