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15 दिसंबर 2010

अक्षय पात्र - आयीये बच्चो को खाना खिलाये! और उन्हे पढ़ायें

चैतन्यपूजा ! हर रूप में विद्यमान चैतन्य की-परमेश्वर की हर संभव रूपसे पूजा!

अक्षय पात्र फौंडेशन ने पूजा शुरू की एक सच्चे ईश्वर की ! बच्चोंकी | बच्चोंको खाना नही मिलेगा तो पढेंगे कैसे? यह छोटासा विचार बना महान क्रांति का सर्जक | और शुरू हुआ  अक्षय पात्र फौंडेशन.

13 दिसंबर 2010

कुछ अच्छा लगता है .............

ठण्ड चल रही है, हलकी हलकी धूप में एक दिन टहल रहती थी | इतना अच्छा लग रहा था, ऐसा लगा  किसीको बताऊ बहुत अच्छा लग रहा है .........

हलकी हलकी धुप में
टहलना अच्छा लगता है

08 दिसंबर 2010

काव्य कुछ नया सा -५

शायद प्रभात होने वाली है, सबसे प्रसन्न समय, बहुत ठण्ड है | यह वेला सबसे पवित्र मानी जाती है | हाँ यह है अमृत वेला .......मन में एक नयाही आनंद उठा | आपको बताये बिना मन रहा नहीं | वैसे पूजा तो प्रातः काल में ही होती है |

पूजा नयी, चैतन्य की
अभिव्यक्ति यह ह्रदय की 
आभास नया, आकाश नया 
सहसा हुआ प्रकाश नया

07 दिसंबर 2010

काव्य कुछ नया सा -४

कुछ नया नया सा जीवन में हो रहा है | ब्लागिंग से या कहे हमारी पूजा से ध्यान जरा हट गया | आज पुनः उपस्थित हूँ |

मेरा यह काव्य नया 
अलंकार दिव्य बना नया 
प्रश्न नया उत्तर नया 
मिला मुझको आशिष नया

02 दिसंबर 2010

काव्य कुछ नया सा -३

कल बीमार थी | अत: कल कुछ प्रस्तुत न कर सकी | आपकी क्षमा चाहती हूँ |

इससे नहीं कुछ और नया 
जीवन का आस्वाद नया 
प्रसाद यह गुरूजी का नया 
प्रकट हुआ चैतन्य नया

30 नवंबर 2010

काव्य कुछ नया सा -२

या उगेगा सुरज नया 
जो भी हो हो कुछ नया 
मिले सबको सब कुछ  नया 
और क्या मांगू तुझसे 
हे भगवन!
मेरा तो जीवन बना नया 

29 नवंबर 2010

काव्य कुछ नया सा

लिखना है कुछ नया 
करना है कुछ नया 

ऐसा हो काम मेरा 
हर दिन बने कुछ नया 

नूतनताही अस्तित्व मेरा 

26 नवंबर 2010

उठा वह गांडीव

आजसे दो वर्ष पूर्व मुंबई पे एक और भयंकर दहशतवादी हमला हुआ था | इसी पार्श्वभूमी पे यह काव्य है | देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को अबाधित रखने का कार्य और कर्तव्य केवल भारतीय सैन्य का नही, वरन हम में से हर एक का है |

अर्जुन का प्रिय शस्त्र था गांडीव| हमारे पास भी ऐसे शस्त्र है जिनसे हम देशकी सुरक्षा में योगदान , महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है |

सोचीये आप के पास कौनसा शस्त्र है?

वह शस्त्र हो सकता है त्याग का ,सत्य का, निष्ठा का! वह हो सकता है तपस्या का! वह शस्त्र हो सकता है कलम का जो लोगोंको जाग्रत करे! हो सकता है आंतरताने का , या ब्लाग का ! वह शस्त्र  हो सकता है बहिष्कार का! देशद्रोहीयो को  पहचानो और बहिष्कृत करो |

कोई आवश्यकता नही है न्यायव्यवस्था तोडने की| कानून की सीमा में रहके भी यह हो सकता है| हिंदुत्व अब बदनाम नही होगा! वरन होगा एक आदर्श  विश्व के लिये !

झुकना पडेगा सबको सत्य के सामर्थ्य के आगे !

आओ ! कार्य संस्कृती के साथ देशकी संस्कृती की रक्षा करे|

हम नही बनेंगे 'मनमोहक' बातें करनेवाले जो बस सबके मन को प्रसन्न करती है !

यह काव्य श्रीमद्भगवद्गीता पार आधारीत है | जब  धर्म और न्याय कि रक्षा के लिये कुरुक्षेत्र का महा युद्ध आरंभ होनेवाला था, अचानक अर्जुन  को मोह उत्पन्न हुआ, उन्होंने शस्त्र रख दिए, तब श्रीमद्भागवद्गीता का जन्म हुआ, साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के मुखकमल से!
उसीका भाव इस काव्य में




उठा वह गांडीव और 
खड़ा रह युद्ध को 

आज्ञा है मेरी तुम्हे 
मार उन अधर्मियों को  

धर्मंरक्षण कर्त्तव्य तेरा 
सोचते रहना अब नहीं 

ईश्वर ने भेजा है तुझे 
कार्य के लिए इसी 

कर्त्तव्य छोड़के जीना 
कलंक होगा कीर्तिको तेरे 

ज्ञान मुझे बता रहा जो तू 
अज्ञान वह सत्य है 

अब करो वही जो
ज्ञान सनातन सत्य है 

क्षत्रियोंको न शिष्य - गुरु
क्षत्रियोंको न पुत्र - पिता

युद्ध कर्त्तव्य क्षत्रिय का  
स्मरण कर इस सत्य को

भूल गया तू धर्मं तेरा
भूल गया तू जन्म तेरा

अमानुष वह कर्म तेरे
भूल गया क्या बता मुझे

बोलना तेरा यह मूर्खता
वीरताको कलंक है

क्लैब्य पकडके बैठना
वीरताको कलंक है
तेरे जीवनको कलंक है

ऊठ ऊठ अतिशीघ्र ऊठ
व्यर्थ समय अब मत गवा

कर्त्तव्य तेरा सामने है
इससे दूर भागो नहीं

पुनः पुनः है वचन मेरा
विजय युद्ध में है तुम्हारा

अधर्मसे यह पहलेही मरे है
समाप्त करना इन्हें अब काम तेरा

अविचल खड़ा ध्येय पे रह
चंचलता स्वभाव नहीं तेरा

बात मेरी अब सुन
संन्यास नहीं कर्त्तव्य  तेरा

झूठा है यह ज्ञान तेरा
उपजा जो मोह से

सत्य है बस यही
युद्ध अब अधर्मसे

देख उन दीन जनोंको
जो राह तेरी देख रहे है

उनके लिये है जीना
कर्तव्य सत्य तेरा
उनके  लिए है युद्ध करना
कर्त्तव्य सत्य तेरा

  
अगर आपके हृदयमे यह अग्नि है तो इसे और प्रज्वलित करें और कराएँ जनताके हृदयमे ! धर्मं और अधर्म के बीच का अंतर जानिये| धर्मनिरपेक्ष बनते बनते अधर्म का साथ देनेकी भूल हमसे न हो |  



( यहाँ अर्जुन के विषय में अमानुष कर्म कहा गया है जो इस अर्थसे है - अर्जुन के कर्म मानवी मर्यादाओं से परे थे , अर्जुनने साक्षात् भगवान शंकर को युद्ध में तृप्त करना, जीवित ही स्वर्ग जाना,  अस्त्र प्राप्ति, और भी अनेक ऐसे  ) 



अद्यतन : अंत की दो पंकियाँ आज मोक्षदा एकादशी - अर्थात गीता जयंती के पर्व पर समाहित की गयी है| साथ ही प्रतिमा भी समाहित की गयी है| दि. ६/१२/२०११ .

25 नवंबर 2010

यश दो हे भगवान -२

तेरे बिना मै जी न सकूँ ||
तुझ बिन मै कुछ कर न सकूँ || २० ||

तू ही मुझको तडपाती है ||
दूर मुझको काहे  रखती है || २१ ||

गोविन्द क्यों तू ऐसे बोले ||
मेरी परीक्षा ऐसे लेते || २२ ||

कहाँ परीक्षा इस प्रेम में ||
जो है अनादी, है सदासे || २३ ||

प्रेम का ही रूप विरह ||
प्रेम बढाये जीवन में || २४ ||

इस काव्य का प्रथम भाव यहाँ देखें -चैतन्यपुजा: यश दो हे भगवान

24 नवंबर 2010

यश दो हे भगवन

यश दो हे भगवन तुम || 
तेरे इस पूजन को || १ ||

तेरी प्राप्ति करा दे ||
मेरे इस जीवन को || २ ||

यश दो हे भगवान तुम || 
मेरे इस सपने को || ३ ||

सपना मेरा तुम हो  || 
जीवन मेरा तुम हो || ४||

तुमसे हो आज मिलन  || 
प्रार्थना मेरी सुन लो || ५ ||

तुम बिन जीवन मेरा  || 
व्यर्थ श्रम का ढेरा || ६ ||

पावन इसे कर दो 
||
यश जीवन को दे दो || ७ ||

तुम हो मेरा सपना  || 
तुम बिन कोई न अपना || ८  ||

स्वीकार मुझको कर लो  ||
जीवन तुमसे भर दो  || ९ ||

यश दो हे भगवन तुम  || 
मेरे इस जीवन को  || १० ||

यश दो हे भगवन तुम  || 
मेरे इस प्रण को || ११ ||

प्राण हो मेरे तुमही  || 
तुमसे है प्राण मेरे  || १२ ||

मेरे जीवन को भर हो  || 
आज प्यार से तेरे  || १३ ||

तरसी हूँ बरसो मै  || 
तेरी राह में कृष्ण  || १४ ||

प्यासी हूँ मै बरसो  || 
तेरे लिए हे कृष्ण  || १५ ||

अब जल्दी से आजा  || 
जीवन को प्रेम से भर जा  || १६ ||

राधा तड़प रही है || 
अब तो गोविन्द आजा  || १७ ||

राधे तुझसे दूर कहाँ मैं || 
तेरी तो हूँ छाया मै  || १८ ||

तुझसे ही जीवन मेरा || 
राधा तू है प्राण मेरा   || १९ ||